आर्तिहर स्तोत्रम्

आर्तिहर स्तोत्रम्

श्रीशम्भो मयि करुणाशिशिरां दृष्टिं दिशन् सुधावृष्टिम् ।
सन्तापमपाकुरु मे मन्ता परमेश तव दयायाः स्याम् ॥ १ ॥

अवसीदामि यदार्तिभिरनुगुणमिदमोकसोऽंहसां खलु मे ।
तव सन्नवसीदामि यदन्तकशासन न तत्तवानुगुणम् ॥ २ ॥

देव स्मरन्ति तव ये तेषां स्मरतोऽपि नार्तिरिति कीर्तिम् ।
कलयसि शिव पाहीति क्रन्दन् सीदाम्यहं किमुचितमिदम् ॥ ३ ॥

आदिश्याघकृतौ मामन्तर्यामिन्नसावघात्मेति ।
आर्तिषु मज्जयसे मां किं ब्रूयां तव कृपैकपात्रमहम् ॥ ४ ॥

मन्दाग्रणीरहं तव मयि करुणां घटयितुं विभो नालम् ।
आक्रष्टुं तान्तु बलादलमिह मद्दैन्यमिति समाश्वसिमि ॥ ५ ॥

त्वं सर्वज्ञोऽहं पुनरज्ञोऽनीशोऽहमीश्वरस्त्वमसि ।
त्वं मयि दोषान् गणयसि किं कथये तुदति किं दया न त्वाम् ॥ ६ ॥

आश्रितमार्ततरं मामुपेक्षसे किमिति शिव न किं दयसे ।
श्रितगोप्ता दीनार्तिहृदिति खलु शंसन्ति जगति सन्तस्त्वाम् ॥ ७ ॥

प्रहराहरेति वादी फणितमदाख्य इति पालितो भवता ।
शिव पाहीति वदोऽहं श्रितो न किं त्वां कथं न पाल्यस्ते ॥ ८ ॥

शरणं व्रज शिवमार्तीः स तव हरेदिति सतां गिराऽहं त्वाम् ।
शरणं गतोऽस्मि पालय खलमपि तेष्वीश पक्षपातान्माम् ॥ ९ ॥

इति श्रीश्रीधरवेङ्कटेशार्यकृतं आर्तिहरस्तोत्रम् ।


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