
अहोई अष्टमी - संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए करें व्रत

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पूजा
अहोई अष्टमी - संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए करें व्रत
अहोई अष्टमी 2025 इस बार सोमवार, 13 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। यह पावन व्रत माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए करती हैं। यह विशेष व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद और दीपावली से आठ दिन पहले आता है। इस दिन माताएँ सूर्योदय से लेकर तारों के दर्शन तक निर्जला व्रत रखती हैं और संध्या के समय तारे देखकर व्रत का समापन करती हैं। उत्तर भारत में इसे “अहोई आठें” भी कहा जाता है।
अहोई अष्टमी 2025: तिथि और मुहूर्त
- व्रत तिथि: सोमवार, 13 अक्टूबर 2025
- पूजा मुहूर्त: शाम 5:58 बजे से 7:00 बजे तक
- तारे देखने का समय: लगभग 6:30 बजे शाम
- चंद्रोदय का समय: रात 11:30 बजे (स्थानीय पंचांग अनुसार)
संध्या के शुभ मुहूर्त में पूजा करना सबसे अधिक फलदायी माना जाता है।
अहोई अष्टमी का महत्व
- - यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए किया जाता है।
- - अहोई माता की आराधना से संतान को अकाल संकटों से रक्षा मिलती है।
- - उत्तर भारत की परंपरा में यह व्रत मातृत्व और संतान के प्रति माँ की निःस्वार्थ भक्ति का प्रतीक है।
अहोई अष्टमी की पूजा कैसे करें?
- माताएँ सूर्योदय से निर्जला व्रत आरंभ करती हैं।
- शाम को घर की दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाया या स्थापित किया जाता है, जिसमें स्याल (लोमड़ी) और सात पुत्रों का चित्रण होता है।
- तारे उदित होने पर माता की पूजा और अर्घ्य अर्पित कर व्रत खोला जाता है।
- अंत में प्रसाद बाँटा जाता है और परिवार संग भोजन किया जाता है।
- यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि माँ के प्रेम और त्याग की गहरी अभिव्यक्ति है।
- अष्टमी तिथि को सदैव शक्ति और रक्षा का प्रतीक माना गया है।
इस दिन अहोई माता की पूजा करने से:
क्षेत्रीय परंपराएँ
- उत्तर प्रदेश और दिल्ली: यहाँ यह व्रत हर घर में बड़े उत्साह से किया जाता है।
- हरियाणा और पंजाब: महिलाएँ सामूहिक रूप से अहोई माता का व्रत करती हैं।
- राजस्थान: पारंपरिक रूप से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाकर पूजा की जाती है।
- मध्य प्रदेश और बिहार (कुछ क्षेत्रों में): संतानवती स्त्रियाँ श्रद्धा से यह व्रत करती हैं।
क्या करें
- संध्या काल में अहोई माता की विधिवत पूजा करें।
- तारे उदित होने पर उन्हें अर्घ्य देकर व्रत का समापन करें।
- संतान की लंबी आयु और कल्याण की प्रार्थना करें।
क्या न करें
- व्रत के दिन झूठ, क्रोध या अपशब्दों से बचें।
- अशुद्ध अवस्था में पूजा न करें।
- व्रत के दौरान जल या अन्न का सेवन न करें, क्योंकि यह निर्जला व्रत है।
आधुनिक प्रासंगिकता
आज के व्यस्त जीवन में भी अहोई अष्टमी का महत्व कम नहीं हुआ है। माताएँ डिजिटल कैलेंडर, पूजा ऐप्स और ऑनलाइन कथा के माध्यम से इस व्रत को निभाती हैं। कहीं वर्चुअल पूजा से लोग जुड़ते हैं तो कहीं सामूहिक सत्संग का आयोजन होता है।
अहोई अष्टमी केवल एक व्रत नहीं बल्कि मातृत्व, त्याग और संतान के प्रति असीम स्नेह का प्रतीक है। यह पर्व माँ-बच्चे के रिश्ते को और गहरा करता है और संतान की रक्षा में आस्था की शक्ति को जगाता है। अहोई अष्टमी का व्रत पूर्ण श्रद्धा से करने पर घर में शांति, बच्चों के जीवन में दीर्घायु और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।