
क्या है अंबुवाची पर्व, अंबुवाची के दौरान क्या करें?

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पूजा
क्या है अंबुवाची पर्व, अंबुवाची के दौरान क्या करें ?
भगवती के सबसे महत्वपूर्ण शक्तिपीठों में से एक है कामाख्या। इनके दर्शन पूजन से विविध मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह महाशक्तिपीठ कहलाता है 'कामाख्या देवी का मंदिर'। यह मंदिर असम राज्य के गुवाहाटी में एक पहाड़ी पर बना है। यह मंदिर अन्य शक्तिपीठों की अपेक्षा थोड़ा भिन्न है क्योंकि यह स्थल तंत्र साधना के लिए भी बहुत प्रसिद्द है।
योनि भाग की होती है पूजा
इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर माता सती का योनि भाग गिरा था इसलिए यहां देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है जोकि शिला के रूप में विराजमान है। यहां नील पर्वत पर स्थित इस जगह माता कामाख्या साक्षात निवास करती हैं। जो मनुष्य इस शिला का पूजन, दर्शन और स्पर्श करते हैं वे देवी कृपा तथा मोक्ष के साथ मां भगवती का सानिध्य प्राप्त करते हैं।
केवल इसी शक्तिपीठ में देवी मां 64 योगनियों और दस महाविद्याओं के साथ विराजित हैं। भुवनेश्वरी, बगला, छिन्न मस्तिका, काली, तारा, मातंगी, कमला, सरस्वती, धूमावती और भैरवी एक ही स्थान पर विराजमान हैं। वैसे सभी शक्तिपीठों का अपना महत्व है पर अन्य सभी में कामाख्या शक्तिपीठ को सर्वोत्तम माना जाता है। कालिका पुराण के अनुसार इसी स्थान पर कामदेव शिव के त्रिनेत्र से भस्म हुए तथा अपने पूर्व रूप की प्राप्ति का वरदान पाया था। यहां कामनारूपी फल की प्राप्ति होती है। माता कामाख्या के साथ गर्भ ग्रह में दस महाविद्याओं में श्रेष्ठ मातंगी और कमला साथ में है।
क्या है अम्बुबाची पर्व
अम्बुबाची शब्द अम्बु और बाची दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है जिसमें अम्बु का अर्थ है पानी और बाची का अर्थ है उतफूलन। यह शब्द स्त्रियों की शक्ति और उनकी जन्म क्षमता को दर्शाता है। प्रतिवर्ष जून के महीने में यह मेला उस वक्त लगता है जब मां कामाख्या ऋतुमती रहती हैं। अम्बुबाची योग पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भ गृह के कपाट बंद हो जाते हैं और उनके दर्शन भी निषेध हो जाते हैं। तीन दिनों के उपरान्त मां भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है। चौथे दिन ब्रह्म मुहूर्त में देवी को स्नान करवाकर श्रृंगार के उपरान्त ही मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है।
तांत्रिकों का महापर्व है अंबुवाची
यहां आने पर सबसे पहले कामेश्वरी देवी और कामेश्वर शिव के दर्शन प्राप्त हैं। इसके बाद गर्भग्रह में महामुद्रा के दर्शन करते हैं। देवी का योनिमुद्रापीठ दस सीढ़ी नीचे एक गुफा में स्थित है जहाँ हमेशा अखंड दीपक जलता रहता है। यहाँ आने-जाने का मार्ग अलग बना हुआ है, यहाँ पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक कपडा दिया जाता है जिसे अम्बुबाची वस्त्र कहते हैं।
कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह में स्थित महामुद्रा के आस-पास सफ़ेद वस्त्र बिछा दिए जाते हैं,तीन दिन बाद जब मंदिर के पट खोले जाते हैं तब यह वस्त्र माता के रज से रक्तवर्णं हो जाते हैं। बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। कहते हैं इस वस्त्र को धारण करके उपासना करने से भक्त की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।
कहते हैं ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है। कामाख्या में
अम्बुबाची पर्व के अलावा दो उत्सव और मनाए जाते हैं जिनमें से एक है 'देवध्वनि' जिसे 'देऊधाबी' कहते हैं,इसमें बाध्ययंत्रों के साथ नृत्य किया जाता है। पौष माह के कृष्ण पक्ष में पुष्य नक्षत्र में पुष्याभिषेक उत्सव मनाया जाता है जिसमें कामेश्वर की चल मूर्ति को कामेश्वर मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाता है। दूसरे दिन भगवती के पंचरत्न मंदिर में दोनों मूर्तियों का हर-गौरी विवाह महोत्सव मनाया जाता है। महाकुंभ कहे जाने वाले इस मेले के दौरान तांत्रिक शक्तियों को काफी महत्व दिया जाता है। यहाँ सैंकड़ों तांत्रिक अपने एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं।
अंबुवाची में आप क्या करें ?
अंबुवाची उत्सव के दौरान माता कामाख्या के दर्शन निषेध है। आप इस दौरान घर पर ही रहकर मां कामाख्या की स्तुति कर सकते हैं। आप मां कामाख्या को प्रसन्न करने के लिए कुछ ये उपाय करें -
- अंबुवाची के बाद किसी कन्या को भोज पर बुलाएं।
- अंबुवाची के दौरान तीन दिन मां कामाख्या के स्तोत्र का पाठ करें।
- किसी महिला का अपमान ना करें।
- माता कामाख्या के मंत्रों का जाप करें।
- तीन दिन पौधरोपण या पृथ्वी पर गढ्डे खोदने से बचें।
- किसी पवित्र नदी में स्नान ना करें।
- कामाख्या क्षेत्र से बाहर भी किसी देवी के दर्शन के दौरान देवी को स्पर्श ना करें।
- हो सकें तो एक समय का व्रत रखेँ।

लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।