बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग - पंचशूल और रावण से जुड़ी अद्भूत कथा

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग - पंचशूल और रावण से जुड़ी अद्भूत कथा

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग - पंचशूल और रावण से जुड़ी अद्भूत कथा

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग नवां ज्योतिर्लिंग है। यहां पर शिव भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हर दिन लाखों भक्तयहां जल चढ़ाने आते हैं। बैद्यनाथ भूमि को चिताभूमि और यहाँ के ज्योतिर्लिंग को कामना लिंग भी कहा जाता है। वह इसलिए भी कि यहाँ की पूजा से विशेष इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना से जुड़ी एक दिलचस्प कथा है। कथा के अनुसार, एक बार रावण के मन में इच्छा हुई कि वे अपने प्रिय भगवान् शिवजी को अपने राज्य लंका में लेकर आएं। इसके लिए उसने घोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न किया। रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने नौ सिर काटकर यज्ञ में अर्पित कर दिए। जब वह 10वां सिर काटने जा रहा था, तभी भगवान शिव प्रकट हो गए और रावण को वरदान में अपना आत्मलिंग (शिवलिंग) दिया। साथ ही यह शर्त रखी कि यह शिवलिंग जहाँ एक बार जमीन पर रखा जाएगा, वहीं स्थायी रूप से स्थापित हो जाएगा।

विष्णुजी की लीला और लिंग की स्थापना

यदि रावण वो शिवलिंग लंका में स्थापित कर लेता, तो अनर्थ हो जाता। रावण की इसके पीछे मंशा भी ठीक नहीं थी। जब भगवान विष्णु रावण की चाल को समझ गए, तो उन्होंने देवताओं के हित के लिए एक योजना बनाई। जब रावण आत्मलिंग को लेकर लंका जा रहा था, तब देवताओं ने वरुण देव को कहा कि रावण को लघुशंका की आवश्यकता हो। रावण जब लघुशंका के लिए जाने लगा, तो उसे एक ग्वाला दिखा। वो ग्वाला भगवान विष्णु थे। रावण ने उस ग्वाले से शिवलिंग पकड़ने की विनती की और लघुशंका के लिए चला गया। उसके जाते ही विष्णु जी ने शिवलिंग वहीं जमीन पर रख दिया, जिससे वो वहीं स्थापित हो गया। कुछ कहानियों में उस ग्वाले को भगवान गणेश का रूप बताया गया है। रावण थोड़ी देर में लौटा, लेकिन तब तक ग्वाला शिवलिंग को जमीन पर रख चुका था। रावण ने लाख कोशिशें कीं, पर वह शिवलिंग जमीन से हिला नहीं सका। क्रोध में आकर उसने उसे दबाने की कोशिश की, जिससे लिंग का कुछ हिस्सा ज़मीन में धँस गया। लेकिन तब से यहां बैद्यनाथ के रूप में शिवजी वास करने लगे और इसी रूप में उन्हें पूजा जाने लगा।

इस स्थान का नाम बैद्यनाथ क्यों पड़ा?

जब रावण के कटे हुए सिरों की पीड़ा को भगवान शिव ने ठीक किया, तब वे वैद्य (चिकित्सक) रूप में प्रकट हुए थे। इस कारण से इस स्थान को "बैद्यनाथ" कहा गया। यहाँ जो भी श्रद्धापूर्वक भगवान श्री बैद्यनाथ का अभिषेक करता है, उसका शारीरिक और मानसिक रोग अतिशीघ्र नष्ट हो जाता है। इसलिए वैद्यनाथधाम में रोगियों व दर्शनार्थियों की विशेष भीड़ दिखाई पड़ती है।

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग में है पंचशूल

देश के अन्य ज्योतिर्लिंग में आपको त्रिशूल देखने को मिलेंगे. लेकिन बाबा बैद्यनाथ मंदिर में परिसर में कुल 22 मंदिर है। सभी में पंचशूल विराजमान है। छिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम सरीरा, यानी यह पंचशूल हमारे शरीर के पांच तत्व का प्रतीक है। इसके साथ ही दूसरा यह महत्व है कि यह पंचशूल मानव शरीर के पांच विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह और ईर्ष्या का नाश करना है।पंचशूल को लेकर एक कथा भी है। धार्मिक ग्रंथ में यह उल्लेख है कि रावण के लंका पुरी के द्वार पर पंचशूल के रूप में सुरक्षा कवच मौजूद था। रावण को पंचशूल की सुरक्षा कवच को भेदना आता था. जबकि भगवान राम इस कवच को नहीं भेद पा रहे थे। विभीषण के युक्ति बताने के बाद ही भगवान राम लंका में प्रवेश कर पाए थे. कुछ मान्यताएं हैं कि वही पंचशूल देवघर के बैद्यनाथ मंदिर में लगा हुआ है। जिसके कारण ही कोई प्राकृतिक आपदा मंदिर की क्षति नहीं कर पाई है।

लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

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