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मंत्र
ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारूढाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।
अर्थ: हम चार मुख वाले सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा का ध्यान करते हैं, जो दिव्य हंस वाहन पर विराजमान हैं। वे परम बुद्धि हमारे मन को सत्य, ज्ञान और धर्म के मार्ग पर प्रेरित करें।
ॐ वेदात्मने विद्महे, हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।
अर्थ: हम उन ब्रह्मा का ध्यान करते हैं जो वेदों के स्वरूप और सम्पूर्ण सृष्टि के कारणभूत हैं। वे हमारे भीतर ज्ञान का प्रकाश प्रज्वलित करें और विवेक प्रदान करें।
ॐ ब्रह्मणे नमः।
अर्थ: उस ब्रह्म स्वरूप प्रभु को नमन, जो अनादि, अनन्त और सर्वव्यापक चैतन्य का प्रतीक हैं।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः सत्चिदेकं ब्रह्मो।
फल: इस शक्तिशाली मंत्र का जप करने से ज्ञान, सृजनशक्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह व्यक्ति को यश, बुद्धि, वैभव और सफलता प्रदान करता है। नियमित जप से भ्रम, भय और मानसिक अस्थिरता दूर होती है तथा वाणी और विचार में दिव्यता आती है।
गुरुर् ब्रह्मा गुरुर् विष्णुः गुरुर् देवो महेश्वरः। गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थ:
ॐ नमस्ते परमं ब्रह्म नमस्ते परमात्मने। निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सद्याय नमो नमः॥
अर्थ: परम ब्रह्म, जो सर्वव्यापक, निराकार और अनन्त आत्मा हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार। हे निर्गुण, सच्चिदानंदस्वरूप प्रभु, आपको शत-शत प्रणाम।
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार भगवान ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं। उन्होंने समय, दिशा, जीव, वनस्पति और मनुष्य सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की। उनके चार मुख चार वेदों — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद — के प्रतीक हैं। ये चारों मुख ज्ञान और धर्म के चार मार्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सृष्टि की रचना के समय भगवान ब्रह्मा ने एक दिव्य नारी "सतरूपा" की सृष्टि की। उनकी सुंदरता को देखकर ब्रह्मा आकर्षित हो गए और जहाँ-जहाँ सतरूपा गईं, वहाँ-वहाँ ब्रह्मा ने उसका दर्शन करने हेतु नया मुख बना लिया।
यह कथा हमें यह शिक्षा देती है कि अहंकार और मोह से मुक्ति प्राप्त करना ही सच्चा ज्ञान है। आत्मसंयम और विनम्रता ही ब्रह्मा का वास्तविक संदेश है।
