चतुः श्लोकी स्तोत्रम्

चतुः श्लोकी स्तोत्रम्

सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो व्रजाधिपः ।
स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः क्वापि कदाचन ॥ १ ॥

एवं सदा स्म कर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति ।
प्रभुः सर्वसमर्थो हि ततो निश्चिन्ततां व्रजेत् ॥ २ ॥

यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि ।
ततः किमपरं ब्रूहि लौकिकैर्वैदिकैरपि ॥ ३ ॥

अतः सर्वात्मना शश्वद्गोकुलेश्वरपादयोः ।
स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः ॥ ४ ॥

इति श्रीवल्लभाचार्य विरचितं चतुः श्लोकी स्तोत्रम् ॥


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