चिन्तामणि षट्पदी

चिन्तामणि षट्पदी

द्विरदवदन विषमरद वरद जयेशान शान्तवरसदन ।
सदनवसादन दयया कुरु सादनमन्तरायस्य ॥ १ ॥

इन्दुकला कलितालिक सालिकशुम्भत्कपोलपालियुग ।
विकटस्फुटकटधाराधारोऽस्यस्य प्रपञ्चस्य ॥ २ ॥

वरपरशुपाशपाणे पणितपणायापणायितोऽसि यतः ।
आरूह्य वज्रदन्तं आखुं विदधासि विपदन्तम् ॥ ३ ॥

लम्बोदर दूर्वासन शयधृतसामोदमोदकाशनक ।
शनकैरवलोकय मां यमान्तरायापहारिचारुदृशा ॥ ४ ॥

आनन्दतुन्दिलाखिलवृन्दारकवृन्दवन्दिताङ्घ्रियुग ।
सुखधृतदण्डरसालो नागजभालोऽतिभासि विभो ॥ ५ ॥

अगणेयगुणेशात्मज चिन्तकचिन्तामणे गणेशान ।
स्वचरणशरणं करुणावरुणालय देव पाहि मां दीनम् ॥ ६ ॥

रुचिरवचोऽमृतरावोन्नीता नीता दिवं स्तुतिः स्फीता ।
इति षट्पदी मदीया गणपतिपादाम्बुजे विशतु ॥ ७ ॥

इति चिन्तामणिषट्पदी ॥


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