श्री दीपलक्ष्मी स्तवम्

श्री दीपलक्ष्मी स्तवम्

अन्तर्गृहे हेमसुवेदिकायां
सम्मार्जनालेपनकर्म कृत्वा ।
विधानधूपातुल पञ्चवर्णं
चूर्णप्रयुक्ताद्भुत रङ्गवल्याम् ॥ १ ॥

अगाध सम्पूर्ण सरस्समाने
गोसर्पिषापूरित मध्यदेशे ।
मृणालतन्तुकृत वर्तियुक्ते
पुष्पावतंसे तिलकाभिरामे ॥ २ ॥

परिष्कृत स्थापित रत्नदीपे
ज्योतिर्मयीं प्रज्ज्वलयामि देवीम् ।
नमाम्यहं मत्कुलवृद्धिदात्रीं
सौदादि सर्वाङ्गण शोभमानाम् ॥ ३ ॥

भो दीपलक्ष्मि प्रथितं यशो मे
प्रदेहि माङ्गल्यममोघशीले ।
भर्तृप्रियां धर्मविशिष्ट शीलां
कुरुष्व कल्याण्यनुकम्पया माम् ॥ ४ ॥

यान्तर्बहिश्चापि तमोऽपहन्त्री
सन्ध्यामुखाराधित पादपद्मा ।
त्रयीसमुद्घोषित वैभवा सा
ह्यनन्यकामे हृदये विभातु ॥ ५ ॥

भो दीप ब्रह्मरूपस्त्वं ज्योतिषां प्रभुरव्ययः ।
आरोग्यं देहि पुत्रांश्च अवैधव्यं प्रयच्छ मे ॥ ६ ॥

सन्ध्यादीपस्तवमिदं नित्यं नारी पठेत्तु या ।
सर्वसौभाग्ययुक्ता स्याल्लक्ष्म्यनुग्रहतः सदा ॥ ७ ॥

शरीरारोग्यमैश्वर्यं अरिपक्षक्षयः सुखम् ।
देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम् ॥ ८ ॥

इति श्री दीपलक्ष्मी स्तवम् ।


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