
श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रम्

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लक्ष्मी स्तोत्र
दीपस्त्वमेव जगतां दयिता रुचिस्ते
दीर्घं तमः प्रतिनिवृत्यमितं युवाभ्याम् ।
स्तव्यं स्तवप्रियमतः शरणोक्तिवश्यं
स्तोतुं भवन्तमभिलष्यति जन्तुरेषः ॥ १ ॥
दीपः पापहरो नॄणां दीप आपन्निवारकः
दीपो विधत्ते सुकृतिं दीपः सम्पत्प्रदायकः ।
देवानां तुष्टिदो दीपः पितॄणां प्रीतिदायकः
दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ॥ २ ॥
दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीप नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥
फलश्रुतिः ।
या स्त्री पतिव्रता लोके गृहे दीपं तु पूरयेत् ।
दीपप्रदक्षिणं कुर्यात् सा भवेद्वै सुमङ्गला ॥
इति श्री दीपलक्ष्मी स्तोत्रम् ॥
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