2026 द्विजप्रिय संकष्टी

2026 द्विजप्रिय संकष्टी

द्विजप्रिय संकष्टी का समय

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी बृहस्पतिवार, फरवरी 5, 2026 को
संकष्टी के दिन चन्द्रोदय - 09:39 पी एम
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ - फरवरी 05, 2026 को 12:09 ए एम बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त - फरवरी 06, 2026 को 12:22 ए एम बजे

2026 द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी

हिन्दु पञ्चाङ्ग में प्रत्येक चन्द्र माह में दो चतुर्थी तिथियाँ होती हैं। जिसमें से पूर्णिमा के उपरान्त आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी तथा अमावस्या के उपरान्त आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के रूप में जाना जाता है।

अमान्त हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार, माघ माह (पूर्णिमान्त फाल्गुन माह) की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। संकष्टी का अर्थ है, संकट से मुक्ति मिलना। इस दिन गणपति भगवान के द्विजप्रिय गणेश स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर पार्वती नन्दन गणेश जी के भक्त उनकी कृपा प्राप्ति हेतु कठिन व्रत का पालन करते हैं। इस व्रत के पालन हेतु चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थी तिथि का चयन किया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिव्य अवसर पर विघ्न विनाशक भगवान श्री गणेश जी की पूजा-अर्चना करने से जीवन में आने वाली समस्त प्रकार की विघ्न-बाधाओं का निवारण होता है।

संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के भक्तगण सूर्योदय से चन्द्रोदय तक कठिन व्रत का पालन करते हैं। इस व्रत में भगवान गणेश के उपासकों द्वारा फलों, तथा भूमि के भीतर उगने वाले जड़ों अथवा वनस्पतियों का ही सेवन किया जाता है। अतः साबूदाना खिचड़ी, आलू तथा मूँगफली आदि को इस व्रत में उपयुक्त आहार माना जाता है। चन्द्र दर्शन के उपरान्त ही द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का पारण किया जाता है।

उत्तरी भारतीय क्षेत्रों में हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार, माघ माह की संकष्टी चतुर्थी को सकट चौथ के रूप में अत्यन्त हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त गणेश जी के भक्त भाद्रपद माह की विनायक चतुर्थी को गजानन भगवान श्री गणेश के जन्म महोत्सव के रूप में अत्यधिक धूम-धाम से मनाते हैं, यह जन्मोत्सव गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजा विधि

  • सर्वप्रथम प्रातः स्नान आदि कर्मों से निवृत्त होकर स्वच्छ हो जायें।
  • तत् पश्चात् गणपति जी का ध्यान करते हुये व्रत पालन का सङ्कल्प ग्रहण करें तथा व्रत की सफलता हेतु प्रार्थना करें।
  • व्रत के समय अधिक से अधिक मौन रहने का प्रयास करें एवं धर्माचरण का पालन करें।
  • सन्ध्याकाल में पुनः स्नान करके लाल रँग के वस्त्र धारण करें।
  • तदोपरान्त पूर्ण विधि-विधान से गणेश जी की पूजा-अर्चना करें तथा उन्हें धुप, दीप एवं ऋतु अनुसार गन्ध, पुष्प, फल आदि अर्पित करें अथवा यथासम्भव षोडशोपचार गणेश पूजन करें।
  • चन्द्रोदय होने के उपरान्त, चन्द्रदेव का पूजन करें तथा उन्हें अर्घ्य एवं नैवेद्य आदि अर्पित करें।
  • पूजन सम्पन्न होने पर व्रत का पारण करते हुये भोजन ग्रहण करें।

द्विजप्रिय संकष्टी व्रत कथा

सत्ययुग के समय युवनाश्व नामक एक राजा शासन करते थे। उनकी सभा में एक विष्णुशर्मा नाम के ब्राह्मण थे, जो सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता थे। विष्णुशर्मा के सात पुत्र एवं सात पुत्रवधु थीं। समय आने पर विष्णुशर्मा वृद्ध हो गये एवं उनकी अवस्था जर्जर होती चली गयी। उनकी इस अवस्था के कारण एक-एक करके छः बहुओं ने उनका तिरिस्कार कर दिया, किन्तु सातवीं अथवा सभी से छोटी वधु पूर्ण-निष्ठा भाव से अपने श्वसुर की सेवा करने लगी।

विष्णुशर्मा प्रकाण्ड ज्ञानी थे अतः सेवा से सन्तुष्ट होकर उन्होंने अपनी बहु को संकष्टी चतुर्थी व्रत के विषय में बताया एवं व्रत पालन करने का निर्देश दिया। अपने श्वसुर की आज्ञानुसार, छोटी बहु ने द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत का पूर्ण श्रद्धा-भाव से पालन किया तथा इस व्रत के फलस्वरूप उसने समस्त प्रकार के भौतिक सुख-साधनों से सम्पन्न एवं आनन्दमयी जीवन व्यतीत करने के पश्चात् अन्त समय में सद्गति को प्राप्त हो गयी। अतः भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त करने हेतु द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत अवश्य करना चाहिये।


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

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