
मंदिर के ऊपर ध्वजा क्यों लगाते हैं, जानिए अभी ?

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पूजा
मंदिर के ऊपर ध्वजा क्यों लगाते हैं, जानिए अभी ?
जब हम किसी मंदिर में जाते हैं, भले ही वह छोटा हो या भव्य... हमें अकसर उस मंदिर के शीर्ष या छत पर गर्व से लहराता हुआ एक झंडा देखते हैं। कुछ लोग इसे झंडा कहते हैं तो कुछ इसे धार्मिक ध्वज का नाम देते हैं। लेकिन क्या कभी आपने ये सोचा है कि आखिर इस झंडे का क्या महत्व है और यह क्यों लगाया जाता है? इसका उपयोग क्या है और हमेशा इसे ऐसे स्थान पर ही क्यों लगाया जाता है, जहां कोई व्यक्ति इसका स्पर्श ना कर सके....? आज हम आपको यही बताने का प्रयास करेंगे
मंदिर के ऊपर ध्वजा
मंदिर के शीर्ष पर ध्वजा लगाने का प्राथमिक कारण यह बताना है कि मंदिर के भीतर उस विशिष्ट दैवीय शक्ति की उपस्थिति है। मंदिर में लगा झंडा उस मंदिर की पवित्रता की उद्घोषणा करता है। यह केवल भक्तों को यह बताने के बारे में नहीं है कि मंदिर के अंदर भगवान कौन है बल्कि यह उस मंदिर की दिव्य और आध्यात्मिक ऊर्जा को भी इंगित करता है। झंडे पर रंगों, प्रतीकों का चुनाव अक्सर उस मंदिर में विराजमान देवता के अनुरूप होता है। पूजा करने आने वाले श्रद्धालु जब उस ध्वज दूर से भी को देखते हैं, तो उन्हें अपने भीतर विराजमान दैवीय शक्ति का स्मरण हो आता है।
उदाहरण के लिए, अर्जुन के रथ पर एक कपिध्वज था जो हनुमान जी की शक्ति और आशीर्वाद का प्रतिनिधित्व करता था। सिर्फ हिंदू धर्म में ही नहीं, बल्कि अन्य बहुत सी संस्कृतियों में भी झंडा फहराना जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। शीर्ष पर स्थित झंडा महज एक सजावटी वस्तु नहीं बल्कि विजय का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि शीर्ष पर ध्वज फहराना उस पवित्र स्थान का प्रतीक है जहां अज्ञानता, अहंकार, ईर्ष्या और इच्छाओं के खिलाफ आध्यात्मिक लड़ाई जीती जाती है। मंदिर की चत पर लहराता झंडा भक्तों के लिए एक प्रतीक के रूप में देखा जाता है कि कैसे पवित्र स्थान और आध्यात्मिक ज्ञान हमेशा विकर्षणों पर विजय प्राप्त करेंगे।
नारंगी ध्वज त्याग का प्रतीक
सनातन धर्म से संबंधित स्थानों और कई मंदिरों में नारंगी झंडे का प्रयोग किया जाता है, जो वास्तव में त्याग का प्रतीक है। नारंगी रंग अक्सर साधु, संतों और उन लोगों से जुड़ा होता है, जिन्होंने सांसारिक इच्छाओं को त्याग दिया है। नारंगी झंडा भी कुछ इसी की याद दिलाता है। ध्वज अहंकार को त्यागने और स्वयं को परमात्मा के प्रति समर्पित करने का एक शक्तिशाली प्रतीक बन जाता है, जैसा कि कई सिद्ध पुजारियों और संतों ने किया है।
नारंगी ध्वजा को देखकर, मनुष्य व्यक्तिगत इच्छाओं और अहंकार पर काबू पाने की आवश्यकता को स्वीकार करना शुरू कर देते हैं, और विनम्र और निस्वार्थ जीवन के मार्ग पर चलते हैं। एक मंदिर के ऊपर का झंडा और ध्वज स्तंभ को पृथ्वी और ब्रह्मांड के बीच की कड़ी माना जाता है। कई लोग कहते हैं कि ध्वज स्तंभ का प्रतिनिधित्व करता है, जो विभिन्न लोकों - सांसारिक, आकाशीय और पाताल को जोड़ने वाली एक ब्रह्मांडीय धुरी है। जैसे कि एक अच्छे, हवादार दिन पर झंडा फहराता है, इसे स्वर्ग से पृथ्वी और इस क्षेत्र में रहने वाले भक्तों के लिए दिव्य ऊर्जा और आशीर्वाद के निरंतर प्रवाह के रूप में देखा जाता है।
दूर से होते हैं ध्वजा के दर्शन
बड़े-बुजुर्ग अकसर यह कहते हैं कि मंदिर के शीर्ष पर लगे ध्वज स्तंभ आगे, उस दिशा में किसी दूसरे मंदिर के संकेतक के रूप में काम करते थे। प्राचीन काल में, जब किसी प्रकार का कोई मानचित्र नहीं था, ऑनलाइन उपकरण नहीं थे तब यही झंडे दिशा-सूचक हुआ करते थे। मंदिर दूर स्थित थे लेकिन झंडे ऊंचे फहराए जाते थे ताकि लोग अपनी तीर्थयात्रा और यात्रा के दौरान उन्हें आसानी से ढूंढ सकें।
किस देवता का ध्वज कैसा
- ब्रह्माजी - झंडे पर हंस का निशान
- विष्णुजी - गरुड़ ध्वज
- शिवजी - वृषभ ध्वज
- मां दुर्गा- सिंह ध्वज
- गणेशजी - कुंभ या मूषक ध्वज
- हनुमानजी - केसरिया ध्वज
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।