कब है गुप्त नवरात्रि - कौन सी देवी की होगी पूजा

कब है गुप्त नवरात्रि - कौन सी देवी की होगी पूजा

सनातन धर्म में देवी साधना के लिए नवरात्रि का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, एक वर्ष में कुल चार नवरात्रि आती हैं। इनमें से चैत्र नवरात्रि और शरद (आश्विन) नवरात्रि को सामाजिक स्तर पर बहुत बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त माघ और आषाढ़ के महीने में भी दो नवरात्रि आती हैं, जिन्हें गुप्त नवरात्रि (Gupt Navratri) कहा जाता है। आमतौर पर गुप्त नवरात्रि में तांत्रिक देवियों और दस महाविद्याओं की गुप्त साधना की जाती है। हालांकि, माता की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए आम श्रद्धालु भी इन पावन दिनों में सात्विक पूजा-पाठ कर सकते हैं। इस वर्ष माघ गुप्त नवरात्रि के पांचवें दिन ही ज्ञान की देवी मां सरस्वती का पर्व बसंत पंचमी भी मनाया जाएगा।

गुप्त नवरात्रि 2026 की तिथियां और घटस्थापना शुभ मुहूर्त

माघ के महीने में आने वाली गुप्त नवरात्रि इस वर्ष जनवरी के महीने में शुरू हो रही है। पंचांग के अनुसार इसके मुख्य नियम और कलश स्थापना का समय नीचे दिया गया है:
  • गुप्त नवरात्रि प्रारम्भ तिथि: सोमवार, 19 जनवरी 2026
  • गुप्त नवरात्रि समाप्त तिथि: मंगलवार, 27 जनवरी 2026
  • सामान्य घटस्थापना मुहूर्त: सुबह 05:44 ए.एम. से सुबह 07:15 ए.एम. तक
  • घटस्थापना अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:03 पी.एम. से दोपहर 12:57 पी.एम. तक

धार्मिक दृष्टिकोण से क्या है गुप्त नवरात्रि का महत्व?

गुप्त नवरात्रि में विशेष अनुष्ठान और साधनाएं मुख्य रूप से अघोरियों, तांत्रिकों और साधुओं द्वारा मां दुर्गा के रौद्र रूपों को प्रसन्न करने के लिए की जाती हैं। मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि के दौरान तांत्रिक अपनी गुप्त सिद्धियों और तांत्रिक सिद्धियों को जाग्रत करने के लिए 10 महाविद्याओं की विशेष आराधना करते हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि गुप्त नवरात्रि की पूजा को जितना अधिक गोपनीय (गुप्त) रखा जाता है, देवी मां उसका फल उतना ही शीघ्र और कई गुना बढ़ाकर देती हैं।

गुप्त नवरात्रि में पूजे जाने वाली 10 महाविद्याएं (10 Mahavidyas)

इस पावन अवधि में देवी के जिन 10 परम शक्तिशाली और अलौकिक स्वरूपों की आराधना की जाती है, उनका विवरण इस प्रकार है:

1. मां काली (Maa Kali)

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर और अन्य भयानक राक्षसों से युद्ध के समय मां दुर्गा का क्रोध अपनी चरम सीमा को पार कर गया था। तब उनके मस्तक से 10 भुजाओं वाली देवी काली का प्राकट्य हुआ। दुर्गा के तीव्र क्रोध से जन्मी इस दिव्य काया का रंग अत्यधिक काला होने के कारण इन्हें 'काली' नाम दिया गया।

2. तारा देवी (Tara Devi)

माता तारा देवी को तीव्र तांत्रिक शक्तियों की मुख्य देवी माना जाता है। भक्तों को संसार के सभी घोर कष्टों से तारने (पार लगाने) वाली देवी के रूप में इनकी पूजा की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, जब हलाहल विष के पान के कारण महादेव का कंठ जलने लगा था, तब मां तारा ने ही बालक रूप में महादेव को अपना दूध पिलाकर उनके कष्ट को शांत किया था।

3. त्रिपुर सुंदरी (Tripura Sundari)

देवासुर संग्राम के समय त्रिपुर सुंदरी ने अपनी अद्वितीय और अलौकिक सुंदरता से सभी असुरों को सम्मोहित कर वश में कर लिया था। माना जाता है कि इनकी आराधना से भक्तों को परम अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। देवी पुराण में माता ललिता के इस स्वरूप की अपार महिमा बताई गई है। गुप्त नवरात्रि में ललिता सहस्रनाम (Lalita Sahasranamam) का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

4. भुवनेश्वरी (Bhuvaneshwari)

मां भुवनेश्वरी साक्षात पूरे ब्रह्मांड की माता हैं। गुप्त नवरात्रि में इनकी साधना से जातक को अखंड राजसत्ता, धन-लक्ष्मी, अटूट वैभव और उत्तम विद्याएं प्राप्त होती हैं। मां भुवनेश्वरी की साधना के लिए कालरात्रि, ग्रहण काल, होली, दीपावली, महाशिवरात्रि या कृष्ण पक्ष की अष्टमी व चतुर्दशी का समय सबसे शुभ और सिद्ध माना गया है।

5. माता छिन्नमस्ता (Chhinnamasta)

झारखंड में स्थित माता छिन्नमस्ता का पावन मंदिर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी ने अपनी सहचरियों की तीव्र भूख को शांत करने के लिए स्वयं अपना मस्तक काट दिया था, इसलिए इन्हें छिन्नमस्ता कहा जाता है। ये ब्रह्मांड में पोषण और रक्षण की मुख्य देवी हैं।

6. त्रिपुर भैरवी (Tripura Bhairavi)

चार भुजाओं और तीन दिव्य नेत्रों से सुशोभित माता त्रिपुर भैरवी की भक्ति से साधक को संसार में युक्ति और मृत्यु के बाद मुक्ति—दोनों की सहज प्राप्ति होती है। इनकी साधना करने से जातक को मनचाही आजीविका, सौभाग्य, आरोग्य और काम सुख का आशीर्वाद मिलता है।

7. मां धूमावती (Dhumavati)

एक बार माता पार्वती ने तीव्र भूख और क्रोध के वशीभूत होकर स्वयं भगवान शिव को निगल लिया था। महादेव को उदरस्थ करने के कारण उनका यह विधवा रूप प्रकट हुआ, जिसे मां धूमावती कहा जाता है। वे मानव जाति के भीतर बसी अंतहीन इच्छाओं और कामनाओं का प्रतीक मानी जाती हैं।

8. माता बगलामुखी (Baglamukhi)

अपने अत्यंत अलौकिक और संहारक रूप के कारण इन्हें बगलामुखी कहा जाता है। इनकी उत्पत्ति गुजरात के सौराष्ट्र में हल्दी के जल से हुई थी, जिसके कारण इन्हें 'पीताम्बरा देवी' भी कहा जाता है। वे स्तंभन (शत्रु की बुद्धि और गति को रोकने) की देवी हैं। इनकी कृपा से बड़े से बड़े शत्रु भी घुटने टेक देते हैं। गुप्त नवरात्रि में बगलामुखी पूजा (Baglamukhi Puja) कराने से मुकदमों और शत्रुओं पर विजय मिलती है।

9. मातंगी (Matangi)

देवी मातंगी को मातंग तंत्र की मुख्य अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इन्हें मुख्य रूप से जूठन का भोग लगाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब शिव जी और उनके गण एक चांडाल स्त्री द्वारा माता पार्वती को लगाए जा रहे जूठन के भोग को रोक रहे थे, तब उस स्त्री की अनन्य और निश्छल भक्ति को सम्मान देने के लिए माता ने स्वयं मातंगी का रूप धारण कर लिया था।

10. कमला देवी (Kamala Devi)

माता कमला देवी साक्षात मां लक्ष्मी का ही तांत्रिक स्वरूप हैं। जो भी भक्त सच्चे और शुद्ध मन से गुप्त नवरात्रि में मां कमला की शरण में जाता है, उसे जीवन में कभी भी धन-धान्य, ऐश्वर्य और भौतिक सुखों की कमी नहीं होती। वे सदैव खिले हुए कमल के सुंदर पुष्प पर आसीन रहती हैं, जिसके कारण उनका नाम कमला पड़ा।

घर पर सरल विधि से कैसे करें गुप्त नवरात्रि की पूजा?

|सामान्य गृहस्थ श्रद्धालु शरद या चैत्र नवरात्रि की तरह ही बहुत ही सरल और सात्विक विधि से घर पर गुप्त नवरात्रि का पूजन संपन्न कर सकते हैं:
  • कलश स्थापना: नवरात्रि के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त (घटस्थापना मुहूर्त) में अपने घर के पूजा स्थल पर कलश की स्थापना करें और अखंड ज्योति प्रज्वलित करें।
  • पाठ और अनुष्ठान: नौ दिनों तक सुबह और शाम दोनों समय मां दुर्गा के सम्मुख बैठकर दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का विधिपूर्वक पाठ अवश्य करें।
  • विशेष भोग: गुप्त नवरात्रि में माता रानी को लौंग और बताशे का भोग लगाना परम शुभ और फलदायी माना जाता है।
  • अर्पण सामग्रियां: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए उन्हें लाल रंग के ताजे फूल और लाल चुनरी/श्रृंगार सामग्री जरूर अर्पित करें। पाठ और भोग के बाद कपूर से मां की कपूर आरती करें।
ध्यान रहे कि अघोरी और तांत्रिक शक्तियां प्राप्त करने के लिए मां दुर्गा और महाविद्याओं की पूजा मध्यरात्रि (आधी रात) में करते हैं, लेकिन सामान्य भक्तों को सुबह और शाम की सात्विक पूजा से ही मां का पूर्ण आशीर्वाद मिल जाता है।

लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

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