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करोड़ों लोगों द्वारा जप की जाने वाली हनुमान चालीसा की कहानी अपने आप में ही अद्भुत है। ये कहानी इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन से जुड़ी हुई है। तुलसीदास जी भारत में मुगलकाल के महान कवि-संत थे। उन्होंने हमें सिर्फ हनुमान चालीसा ही नहीं बल्कि रामायण की सुंदर व्याख्या “रामचरितमानस” भी दी थी।
उनके समय देश में धर्म और समाज में अशांति थी। मुगल बादशाह अकबर के राज में लोगों को फिर से अच्छे रास्ते पर लाने की ज़रूरत थी। भगवान राम के परम भक्त तुलसीदास जी ने लोगों को प्राचीन धर्म ग्रंथों “वेदों” के बारे में बताने का बीड़ा उठाया।
उनकी किताब “रामचरितमानस” बहुत प्रसिद्ध हुई, खासकर उत्तर भारत में। इस कृति ने उनकी मान्यता को और भी ऊंचा कर दिया। भगवान राम के प्रति उनकी भक्ति भी और गहरी हो गई। लोग तुलसीदास जी और उनके बताए देवताओं में बहुत आस्था रखने लगे। जैसे-जैसे उनकी धर्मपरायणता की चर्चा फैली, ज़रूरतमंद लोग मुश्किल समय में उनसे मदद मांगने लगे।
तुलसीदास जी हमेशा एक साधारण और विनम्र भक्त रहे। उनका मानना था कि अच्छे कार्यों का श्रेय सिर्फ भगवान राम को ही जाता है। लेकिन, कुछ लोगों को लगा कि तुलसीदास जी खुद चमत्कार कर सकते हैं। ये अफवाहें बादशाह अकबर तक भी पहुंच गईं।
इन अफवाहों से उत्सुक होकर, अकबर ने तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया ताकि वह उनके चमत्कार देखें। तुलसीदास जी ने हमेशा की तरह विनम्रता से कहा कि वह सिर्फ एक भक्त हैं और ऐसे अलौकिक कार्य नहीं कर सकते। अकबर को लगा कि तुलसीदास जी उनकी बात नहीं मान रहे हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें फतेहपुर सीकरी की जेल में डाल दिया।
लेकिन, कहानी यहीं खत्म नहीं होती है! जेल में रहते हुए तुलसीदास जी ने अपनी गहरी भक्ति के बल पर हनुमान चालीसा की रचना की। माना जाता है कि चालीसा के 40 चैपाई (छंद) तुलसीदास जी के जेल में बिताए 40 दिनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हर चौपाई में उन्होंने हनुमान जी के अद्भुत गुणों, भगवान राम के प्रति उनकी अटूट भक्ति और धर्म की रक्षा करने वाले के रूप में उनकी भूमिका का वर्णन किया।
एक अद्भुत घटनाक्रम में, जैसे ही आखिरी चौपाई लिखी गई, अकबर के महल और पूरे शहर को बंदरों की एक विशाल सेना ने घेर लिया। इस अप्रत्याशित घटना से अकबर को लगा कि शायद तुलसीदास जी को जेल में रखने के कारण ही ये दैवीय दंड हुआ है।
माफी मांगते हुए अकबर जेल में तुलसीदास जी के पास गए और उनसे विनती की कि वो हनुमान जी से प्रार्थना करें। तुलसीदास जी ने एक सच्चे भक्त की तरह हनुमान जी का ध्यान किया और चमत्कार से, बंदरों की सेना गायब हो गई। दैवीय हस्तक्षेप को देखते हुए अकबर ने तुलसीदास जी को जेल से रिहा कर दिया। ये कहानी हिंदू इतिहास में हमेशा याद की जाएगी।
हनुमान चालीसा आज भी गोस्वामी तुलसीदास जी की अटूट भक्ति और हनुमान जी की असीम शक्ति का प्रमाण है। हर पाठ हमें भक्ति की बदलने वाली शक्ति और इस पवित्र मंत्र के चिरस्थायी महत्व की याद दिलाता है।
हनुमान चालीसा का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है। लोग इसे कई कारणों से मानते हैं:
हनुमान जी की भक्ति: हनुमान चालीसा भगवान हनुमान को समर्पित एक भजन है। हिंदू धर्म में, हनुमान जी शक्ति, भक्ति और निष्ठा के प्रतीक हैं। हनुमान चालीसा का पाठ करके लोग हनुमान जी का सम्मान जताते हैं और उनका आशीर्वाद मांगते हैं।
आध्यात्मिक रक्षा: बहुत से लोगों का मानना है कि हनुमान चालीसा का पाठ करने से बुरी शक्तियों, नकारात्मक प्रभावों और बाधाओं से आध्यात्मिक रक्षा मिलती है। चुनौतियों से पार पाने के लिए लोग अक्सर शक्ति और साहस के लिए हनुमान जी का स्मरण करते हैं।
ईश्वर कृपा और आशीर्वाद: भक्त हनुमान चालीसा का पाठ ईश्वर की कृपा, आशीर्वाद और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए करते हैं। हनुमान जी को दयालु देव माना जाता है जो वरदान देते हैं और कठिनाइयों को दूर करने में मदद करते हैं।
चेतना का विकास: हनुमान चालीसा के छंदों में गहरी आध्यात्मिक शिक्षा छिपी हुई है। ऐसा माना जाता है कि इनका नियमित पाठ करने से चेतना का विकास होता है और मन में शांति और सद्भाव आता है।
मंत्र की शक्ति: हनुमान चालीसा के हर छंद में पवित्र मंत्रों की शक्ति समाहित है। ऐसा माना जाता है कि इन मंत्रों का जाप करने से मन और आत्मा पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
रामायण से जुड़ाव: हनुमान चालीसा में रामायण की कुछ घटनाओं का वर्णन है, जिसमें हनुमान जी की भगवान राम के प्रति भक्ति को दर्शाया गया है। इन छंदों को पढ़ने से भक्तों का रामायण और उसकी आध्यात्मिक शिक्षाओं से जुड़ाव मजबूत होता है।
दोहा
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउं रघुवर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।
चौपाई:
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।
महावीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुँचित केसा।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे।
कांधे मूंज जनेउ साजे।
शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन।
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज संवारे।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना।
जुग सहस्र जोजन पर भानु।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।
नासै रोग हरे सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकन्दन राम दुलारे।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।
तुह्मरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै।
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरिभक्त कहाई।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बन्दि महा सुख होई।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
सियावर रामचंद्र की जय !
पवनसुत हनुमान की जय !!
