
1264
पूजा
1. आवहनम् (आमंत्रण) - माता लक्ष्मी का इस मंत्र से आह्वान करें।
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ।।
अर्थ:- हे जातवेदा अग्निदेव आप सोने के समान चमकनेवाली तथा किंचित हरितवर्ण वाली तथा हरिणी रूपधारिणी सुवर्नमिश्रित रजत की माला धारण करने वाली , चाँदी के समान धवल पुष्पों की माला धारण करने वाली , चंद्रमा के समान प्रकाशमान तथा चंद्रमा की तरह संसार को प्रसन्न करने वाली या चंचला के समान रूपवाली महालक्ष्मी को मेरे घर बुलाएं।
2. आसनम् (आसन का अर्पण) - इस मंत्र से माता को बैठने के लिए आसन दें।
ॐ तां म आ व ह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ।।अर्थ:- हे जातवेदा अग्निदेव आप उन जगत प्रसिद्ध लक्ष्मी जी को मेरे घर बुलाएं, जिनके आने से मैं सुवर्ण, गौ, अश्व और पुत्र पौत्रदि को प्राप्त करूँ ।।
3. पद्यं (पैर धोना) - इस मंत्र से पाद्द समर्पण करे
ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद्प्रमोदिनीम् । श्रियम् देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ।।
अर्थ:- जिस देवी के आगे और पीछे में रथ है और जिनके सम्मुख घोड़े रथ से जुते हुए हैं, ऐसे रथ में बैठी हुई, हाथियों की निनाद से संसार को प्रफुल्लित करने वाली देदीप्यमान एवं समस्त जनों को आश्रय देने वाली लक्ष्मी को मैं अपने सम्मुख बुलाता हूँ । देदीप्यमान तथा सबकी आश्रयदाता वह लक्ष्मी मेरे घर में सर्वदा निवास करे ।
5. आचमन – इस मंत्र से आचमन करावे
ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्ती श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् । तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ।। (5) अर्थ:- चंद्रमा के समान प्रकाश वाली सुंदर कान्तिवाली, अपनी कीर्ति से प्रसिद्ध और चमकीली स्वर्ग लोक में इन्द्रादि देवों से पूजित अत्यंत दानशीला, कमल के मध्य रहने वाली, सभी की रक्षा करने वाली एवं आश्रयदाती, प्रख्यात लक्ष्मी को मैं प्राप्त करूँ और अलक्ष्मी का नाश हो।
6. स्नान – इस मंत्र से स्नान करावे
ॐ आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्य अलक्ष्मीः ।। (6) अर्थ:- हे सूर्य के समान कांति वाली देवी आपके तेजस्वी प्रकाश से बिना पुष्प के फल देने वाला एक वृक्ष विशेष उत्पन्न हुआ जिसे बिल्व वृक्ष कहते हैं । आपके हाथ से बिल्व का वृक्ष उत्पन्न हुआ, वह बिल्व वृक्ष का फल मेरे बाह्य और आभ्यन्तर की दरिद्रता को नष्ट करें ।।
7.वस्त्र – इस मंत्र से वस्त्र चढ़ाएं
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह । प्रदुभुर्तॉऽस्मि रास्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिंमृद्धिम ददातु मे ।।
अर्थ:- हे लक्ष्मी ! देवसखा अर्थात श्री महादेव के सखा (मित्र ) इन्द्र, कुबेरादि देवताओं की अग्नि मुझे प्राप्त हो अर्थात मैं अग्निदेव की उपासना करूँ । एवं मणि के साथ अर्थात चिंतामणि के साथ या कुबेर के मित्र मणिभद्र के साथ या रत्नों के साथ, कीर्ति कुबेर की कोषशाला या यश मुझे प्राप्त हो अर्थात धन और यश दोनों ही मुझे प्राप्त हों । मैं इस संसार में उत्पन्न हुआ हूँ, अतः हे लक्ष्मी आप यश और ऐश्वर्य मुझे प्रदान करें ।।
11. .पुष्प – इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं
कर्दमेन प्रजा भूता मयि संभव कर्दम ।
श्रियम वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ।।
अर्थ:- हे कर्दम आप अपनी माँ लक्ष्मी से हमारे लिए ही नहीं, अपितु हमारे सभी परिवार तथा हमारी समस्त प्रजा के कल्याण के लिए हमारे तरफ से प्रार्थना करें, कि माँ लक्ष्मी हम सभी के कल्याणार्थ हमारे घर आयें, हमारे यहाँ आप अपनी माँ के साथ रहें ताकि हम भी सुख पूर्वक निवास करें । हे कर्दम ! आपसे हमारी प्रार्थना है कि आप हमारे घर आयें, हमारे यहाँ निवास करें, क्योंकि आपके हमारे यहाँ आने से माँ लक्ष्मी को मेरे यहाँ आना ही पड़ेगा । हे कर्दम ! मेरे घर में लक्ष्मी निवास करें, केवल इतनी ही प्रार्थना नहीं है अपितु कमल की माला धारण करने वाली संपूर्ण संसार की माँ लक्ष्मी को मेरे घर में आप निवास कराओ ।।
12.धूप – इस मंत्र से धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।।
अर्थ:- जिस प्रकार कर्दम की संतति ‘ख्याति ‘से लक्ष्मी अवतरित हुई उसी प्रकार कल्पान्तर में भी समुन्द्र मंथन द्वारा चौदह रत्नों के साथ लक्ष्मी का भी आविर्भाव हुआ है । इसी अभिप्राय से कहा जा सकता है कि वरुण देवता स्निग्ध अर्थात मनोहर पदार्थो को उत्पन्न करें । (पदार्थो कि सुंदरता ही लक्ष्मी है । लक्ष्मी के आनंद, कर्दम ,चिक्लीत और श्रित – ये चार पुत्र हैं । इनमें ‘चिक्लीत’ से प्रार्थना की गई है कि हे चिक्लीत नामक लक्ष्मी पुत्र ! तुम मेरे गृह में निवास करो । केवल तुम ही नहीं अपितु दिव्यगुण युक्त सर्वाश्रयभूता अपनी माता लक्ष्मी को भी मेरे घर में निवास कराओ ।।
13.दीप – इस मंत्र से दीपक दिखावे
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंडगलां पदमालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह ।।
अर्थ:- हे अग्निदेव ! तुम मेरे घर में पुष्करिणी अर्थात दिग्गजों (हाथियों ) के सूंड से आर्द्र शरीर वाली पुष्टि को देने वाली अथवा पुष्टिरूपा रक्त और पीतवर्णवाली, कमल कि माला धारण करने वाली संसार को प्रकाशित करने वाली प्रकाश स्वरुप लक्ष्मी को बुलाओ ।।
14.नैवेद्य – इस मंत्र से नेवैद्य समर्पण करें
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह ।।
अर्थ:- हे अग्निदेव ! तुम मेरे घर में भक्तों पर सदा दयार्द्रर्चित अथवा समस्त भुवन जिसकी याचना करते हैं, दुष्टों को दंड देने वाली अथवा अवलंबनीया (सारांश यह है, कि ‘जिस प्रकार लकड़ी के बिना असमर्थ पुरुष चल नहीं सकता, उसी प्रकार लक्ष्मी के बिना संसार का कोई भी कार्य नहीं चल सकता), सुन्दर वर्ण वाली एवं सुवर्ण कि माला वाली सूर्यरूपा (अर्थात जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश और वृष्टि द्वारा जगत का पालन -पोषण करता है उसी प्रकार लक्ष्मी ,ज्ञान और धन के द्वारा संसार का पालन -पोषण करती है) अतः प्रकाश स्वरूपा लक्ष्मी को हमारे लिए बुलाओ ।।
15.दक्षिणा – इस मंत्र से दक्षिणा ,आरती एवं पुष्पांजलि दें।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मी मन पगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ।।
(15) अर्थ:- हे अग्निदेव ! तुम मेरे यहाँ उन जगद्विख्यात लक्ष्मी को जो मुझे छोड़कर अन्यत्र न जाने वाली हों, उन्हें बुलाओ । जिन लक्ष्मी के द्वारा मैं सुवर्ण, उत्तम ऐश्वर्य, गौ, दासी, घोड़े और पुत्र -पौत्रादि को प्राप्त करूँ अर्थात स्थिर लक्ष्मी को प्राप्त करूँ ।।
16.नमस्कार – इस मंत्र से नमस्कार करें
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् । सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ।। (16) अर्थ:- जो मनुष्य लक्ष्मी कि कामना करता हो, वह पवित्र और सावधान होकर प्रतिदिन अग्नि में गौघृत का हवन और साथ ही श्रीसूक्त कि पंद्रह ऋचाओं का प्रतिदिन पाठ करें । लक्ष्मी पूजा से प्रसन्न मां सभी को स्थायी लक्ष्मी का आशीर्वाद देती है।