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मंत्र
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यं अग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
अर्थ: यह पवित्र यज्ञोपवीत (जनेऊ) अत्यंत शुद्ध और दिव्य है। यह आयु, ज्ञान तथा तेज प्रदान करता है। इसे धारण करना आत्मिक शुद्धि और धार्मिक अनुशासन का प्रतीक माना गया है।
ॐ आपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः॥
अर्थ: चाहे मनुष्य शुद्ध हो या अशुद्ध, जो भगवान विष्णु का स्मरण करता है, वह भीतर और बाहर दोनों से शुद्ध हो जाता है। यह मंत्र किसी भी पवित्र कार्य के आरंभ से पूर्व, विशेष रूप से जनेऊ धारण से पहले बोला जाता है।
मामोपात्तदुरितक्षयद्वारा श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं यज्ञोपवीतधारणं करिष्ये॥
अर्थ: मैं अपने पापों के नाश और परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए इस पवित्र यज्ञोपवीत को धारण करता हूँ।
ॐ यज्ञोपवीतं पुराणं जरजरं कश्यपोद्भवम्। त्यजामि ब्रह्मनिर्मितं नित्यं सात्त्वगुणात्मकम्॥
अर्थ: मैं इस पुराने और जर्जर यज्ञोपवीत को त्याग करता हूँ, जो कश्यप ऋषि के तेज से उत्पन्न हुआ है और सात्त्विकता का प्रतीक है। अब मैं नए जनेऊ के धारण के लिए स्वयं को तैयार करता हूँ।
यज्ञोपवीतं त्रिगुणं त्रिसूत्रं त्रिधा धारं धराम्यहम्। ब्रह्मण्यदेवाय सदा प्रदातुमूर्ध्वं प्रणमाम्यहम्॥
अर्थ: यह जनेऊ तीन सूत्रों से बना है जो तीन गुणों — सत्त्व, रजस और तमस — का प्रतीक है। यह सत्य, ज्ञान और शुद्ध आचरण का मार्ग दर्शाता है। इसे धारण कर मैं अपने आत्मा को ब्रह्म की ओर उन्नत करता हूँ।
उज्ज्वलं ब्रह्मसूत्रं विष्णोः यज्ञोपवीतिने। नमः परमेष्ठिने तुभ्यं त्रिविधं धर्म धारये॥
अर्थ: हे परम विष्णु! मैं आपके सम्मान में यह उज्ज्वल ब्रह्मसूत्र धारण करता हूँ, जो ज्ञान, कर्म और भक्ति — इन तीनों धर्मों का प्रतीक है।
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम उस परम दिव्य सविता देव के प्रकाशमय स्वरूप का ध्यान करते हैं, जो हमारे बुद्धि को प्रेरित कर हमें सद्मार्ग पर अग्रसर करता है।
कृष्णवर्णं यज्ञसूत्रं ब्रह्मसूत्रं तदुच्यते। पुराणं ब्रह्मणः प्रोक्तं नित्यं पुण्यफलप्रदम्॥
अर्थ: यह ब्रह्मसूत्र (जनेऊ) ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक है। इसे धारण करने से जीवन में पुण्य, बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
लाभ: जनेऊ धारण करने से मन और शरीर की पवित्रता बढ़ती है, आत्मिक बल और एकाग्रता में वृद्धि होती है। यह व्यक्ति को वैदिक परंपरा से जोड़ता है तथा नकारात्मक कर्मों का नाश करता है और ईश्वरीय कृपा प्राप्त होती है।
नियम: जनेऊ को हमेशा बाएँ कंधे से दाएँ बाँह के नीचे की ओर पहनना चाहिए। इसे सदैव स्वच्छ रखना चाहिए और अशुद्ध अवस्था या अमंगल कार्यों में नहीं पहनना चाहिए। जनेऊ का नियमित रूप से परिवर्तन करना चाहिए, विशेषतः पूजा या स्नान के समय। प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जप करना अनिवार्य माना गया है।
