श्री कृष्ण स्तोत्रम् (श्रीमद्भागवते – ज्वरस्तुतिः)

श्री कृष्ण स्तोत्रम् (श्रीमद्भागवते – ज्वरस्तुतिः)

ज्वर उवाच ।
नमामि त्वानन्तशक्तिं परेशं
सर्वात्मानं केवलं ज्ञप्तिमात्रम् ।
विश्वोत्पत्तिस्थानसंरोधहेतुं
यत्तद्ब्रह्म ब्रह्मलिङ्गं प्रशान्तम् ॥ १ ॥

कालो दैवं कर्म जीवः स्वभावो
द्रव्यं क्षेत्रं प्राण आत्मा विकारः ।
तत्सङ्घातो बीजरोहप्रवाह-
-स्त्वन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये ॥ २ ॥

नानाभावैर्लीलयैवोपपन्नै-
-र्देवान् साधून् लोकसेतून् बिभर्षि ।
हंस्युन्मार्गान् हिंसया वर्तमानान्
जन्मैतत्ते भारहाराय भूमेः ॥ ३ ॥

तप्तोऽहं ते तेजसा दुःसहेन
शान्तोग्रेणात्युल्बणेन ज्वरेण ।
तावत्तापो देहिनां तेऽङ्घ्रिमूलं
नो सेवेरन् यावदाशानुबद्धाः ॥ ४ ॥

श्रीभगवानुवाच ।
त्रिशिरस्ते प्रसन्नोऽस्मि व्येतु ते मज्ज्वराद्भयम् ।
यो नौ स्मरति संवादं तस्य त्वन्न भवेद्भयम् ॥ ५ ॥

इति श्रीमद्भागवते दशमस्कन्धे त्रिषष्टितमोऽध्याये ज्वरस्तुतिर्नाम श्री कृष्ण स्तोत्रम् ।


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