मां हरसिद्धि को दी थी विक्रमादित्य ने अपने शीश की बलि

मां हरसिद्धि को दी थी विक्रमादित्य ने अपने शीश की बलि

मां हरसिद्धि को दी थी विक्रमादित्य ने अपने शीश की बलि

भारत देश में ही नहीं पूरी दुनिया में देवी मंदिर और देवी माता की पूजा का विशेष स्थान है। मां दुर्गा की महिमा का वर्णन दुर्गा सप्तशती के साथ हमारे सभी वेद और पुराणों में मिलता है। देशभर में मां हरसिद्धि के अनेकों मंदिर पाए जाते हैं। इन मंदिरों में उज्जैन में स्थित हरसिद्धि मंदिर को सबसे प्राचीन एवं शक्तिपीठ माना जाता है। माता की भक्ति प्राप्त करने के लिये स्वयं राजा विक्रमादित्य ने यहां 12 बार बलि दी थी। महाकाल और शनिदेव की नगरी उज्जैन में स्थित माता हरसिद्धि का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसे राजा विक्रमादित्य की तपोभूमि माना जाता है। मां हरसिद्धि को परमारवंशीय राजाओं की कुलदेवी माना जाता है। इस मंदिर में राजा विक्रमादित्य ने प्रत्येक 12 वर्ष में अपने सर को काटकर बलि दी थी। 11 बार बलि देने पर उनका सर वापस आ गया था। बारहवीं बार जब सर वापस नहीं आया तो राजा विक्रमादित्य के शासन को पूर्ण मान लिया गया। जिसके बाद से भगवान ने यहां शक्तिपीठ की स्थापना की और तब से इस जगह को माता के नाम से जाना जाता है. मान्यता के अनुसार माता के इसी मंदिर से राजा विक्रमादित्य सम्राट बने थे. इसी वजह से यह मंदिर तंत्र क्रिया और सिद्धि साधना का एक जरूरी केंद्र है। मंदिर के लगभग 200 मीटर की दूरी पर ही भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग महाकाल रूप है। इस मंदिर में यंत्र प्रतिष्ठित है, जिसके कारण यह जगह तांत्रिक परंपरा में सिद्धपीठ के रूप में मानी जाती है।

विक्रमादित्य को यहीं से मिली थी यंत्र की सिद्धि

राजा विक्रमादित्य का रिश्ता हरसिद्धि मंदिर से जुड़ा हुआ है। स्कंद पुराण में लिखा हुआ है कि देवी ने प्रचंड राक्षस नामक दैत्य का वध किया था, जिसके बाद से वह हरसिद्धि नाम से जानने लग गई। लोक मान्यताओं के अनुसार माता हरसिद्धि विक्रमादित्य की कुलदेवी थी। माना जाता है कि विक्रमादित्य ने यहां देवी को प्रसन्न किया था और यहीं से उन्हें श्री यंत्र की सिद्धि मिली थी. जिसके बाद से वह न्यायप्रिय राजा कहलाए और पूरे देश पर राज किया।

एक साथ जलाए जाते है 1100 दीप

मंदिर परिसर में स्थित 51 फीट ऊँचा विशाल दीप स्तंभ श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। इस स्तंभ पर एक साथ लगभग 1100 दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। इसके लिए करीब 60 लीटर तेल और 4 किलो रुई की जरूरत होती है। मान्यता है किभक्त जब अपनी मनोकामना पूर्ण होती देखना चाहते हैं, तो वे यहां दीपमाला जलवाते हैं. इस अनोखी परंपरा के कारण कई बार दीप जलाने के लिए लंबा इंतज़ार भी करना पड़ता है.

नौ दिन नहीं कि जाती शयन आरती

हरसिद्धि मंदिर में नवरात्र के नौ दिनों का अलग ही महत्व है। इस दौरान देवी को अनार के दाने, शहद और अदरक का विशेष भोग अर्पित किया जाता है। यह विश्वास है कि इन दिनों माता शयन नहीं करतीं, इसलिए इस अवधि में शयन आरती का आयोजन नहीं होता है। आस्था और भक्ति से भरे इन नौ दिनों में मंदिर का वातावरण दिव्यता और ऊर्जा से भर उठता है।

लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

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