
छिन्नमस्तिका जयंती - छठी महाविद्या से पाएं जीवन के सुख का वरदान

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ज्योतिष
छिन्नमस्तिका जयंती - छठी महाविद्या से पाएं जीवन के सुख का वरदान
दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या माता छिन्नमस्तिका की जयंती साल 2025 में 11 मई को मनाई जाएगी। वैशाख चतुर्दशी को मां का प्राकट्य हुआ था। देवी छिन्नमस्तिका का रूप बेहद ही डरावना लगता है, लेकिन वास्तव में उसके पीछे पोषण और पालन के संदेश छिपे हैं। माता को प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है। कुछ विद्वान मतों के अनुसार माता की उपासना तांत्रिक पद्धति से की जाती है।
तांत्रिक परंपरा से की जाती है मां की पूजा
माता छिन्मस्तिका के उग्र स्वरूप को देखते हुए कई तांत्रिक और अघोरी मां की विशेष पूजा करते हैं। नाथ परंपरा के संन्यासी मां छिन्नमस्तिका के विशेष भक्त रहे हैं। गुरु गोरखनाथ भी मां छिन्नमस्तिका की आराधना करते थे। हिरणाकश्यप तथा विरोचन आदि भी देवी के उपासक थे, इसीलिये देवी को वज्र वैरोचनी के नाम से भी पूजा जाता है। हालांकि ग्रहस्थ भी मां की आराधना सामान्य पद्धति से कर सकते हैं। गुजरात में मां के एक स्वरूप को जोगणी नाम से पूजा जाता है। हालांकि यह जोगणी योगिनी का अपभ्रंश हैं, क्योंकि मां का एक नाम योगिनी भी है।
छिन्नमस्तिका स्वरूप वर्णन
माता छिन्नमस्तिका का स्वरूप अत्यंत ही डरावना है। वे अपने हाथ में अपना कटा हुआ मस्तक पकड़कर रक्तपान करती है। वहीं साथ में उनकी दो सहचरी डाकिनी वर्णिनी भी उनका रक्तपान करती है। रक्त की तीन धाराएं मां के शरीर से निकलती है। देवी का वर्ण एकदम लाल है, लेकिन उनका तेज हजारों सूर्यों से बढ़कर है। कई बार उनके केश बिखरे हुए दिखाई देते हैं।
कैसे हुई मां छिन्नमस्तिका की उत्पत्ति
दरअसल मां छिन्मस्तिका की उत्पत्ति के पीछे दो कहानियां प्रचलित है। मार्कण्डेय पुराण और शिव पुराण के अनुसार, जब देवी ने चण्डी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया था, तो चारों ओर उनका जय घोष होने लगा। देवी की सहायक योगिनियाँ जया और विजया की खून की प्यास शान्त नहीं हो पाई थी। इस पर उनकी रक्त पिपासा को शान्त करने के लिए माँ ने अपना मस्तक काटकर अपने रक्त से उनकी रक्त प्यास बुझाई। इस कारण माता को छिन्नमस्तिका नाम से पुकारा जाने लगा। छिन्नमस्तिका देवी को तन्त्र शास्त्र में प्रचण्ड चण्डिका और चिन्तापूर्णी माता जी भी कहा जाता है।
वहीं एक अन्य कहानी के अनुसार जब मां पार्वती जया और विजया के साथ मंदाकिनी नदी के किनारे थीं, तब दोनों ने मां से अपनी भूख शांत करने की बात कही। तब मां ने अपना मस्तक काटकर से रक्त की तीन धाराएं प्रकट की। दो रक्त धाराओं से जया और विजया की भूख शांत की और तीसरी धारा को उन्होंने स्वयं पिया।
छिन्नमस्तिका देवी की पूजा विधि
- - इस दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
- इसके बाद साफ कपड़े धारण करें।
- मां की पूजा का संकल्प लें।
- एक वेदी पर मां छिन्नमस्तिका की प्रतिमा स्थापित करें।
- देवी को गंगाजल, पंचामृत व साफ जल से स्नान करवाएं।
- देवी को कुमकुम और सिंदूर का तिलक लगाएं।
- मां को गुड़हल के फूलों की माला अर्पित करें।
- लौंग, इलायची, बतासा, नारियल, मिठाई और फल का भोग लगाएं।
- पूजा का समापन आरती से करें।
- देवी के वैदिक मंत्रों का जाप और ध्यान करें।
- पूजा के दौरान हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगे।
- इस दिन कन्या पूजन का भी विधान है।
यदि मां छिन्नमस्तिका का कोई मंत्र आपको नहीं आता है, तो आप छिन्नमस्तिका अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ भी कर सकते हैं।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
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