
6000 साल पुराना है मां छिन्नमस्तिका का ये रहस्यमय मंदिर

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गुप्त नवरात्रि के दौरान विद्या की दस महादेवियों की पूजा का विशेष विधान है। इन दस महाविद्याओं में छठी देवी माँ छिन्नमस्तिका हैं। इनका सबसे प्राचीन और चमत्कारी मंदिर झारखंड की राजधानी रांची से करीब 80 किलोमीटर दूर रजरप्पा में स्थित है। यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूरे विश्व में विख्यात है।
माँ छिन्नमस्तिका मंदिर का इतिहास और महत्व
मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 6000 साल पहले हुआ था, जबकि कई विद्वान इसे महाभारतकालीन मानते हैं। यहाँ बिना सिर वाली देवी की पूजा की जाती है।
- आस्था का केंद्र: नवरात्रि के दौरान यहाँ साधु, महात्माओं और भक्तों का भारी जमावड़ा रहता है।
- मनोकामना पूर्ति: कहा जाता है कि माँ छिन्नमस्तिका के दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।
रजरप्पा शक्तिपीठ: दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ
असम के कामाख्या मंदिर के बाद, रजरप्पा स्थित माँ छिन्नमस्तिका मंदिर को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ माना जाता है।
संगम और प्राकृतिक सौंदर्य
यह मंदिर भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के पवित्र संगम पर स्थित है। पश्चिम से दामोदर और दक्षिण से भैरवी नदी का मिलन इस स्थान की दिव्यता और खूबसूरती को बढ़ा देता है।
मंदिर परिसर के अन्य देवालय
मुख्य मंदिर के अलावा यहाँ सात अन्य महत्वपूर्ण मंदिर भी हैं:
- महाकाली मंदिर और सूर्य मंदिर
- दस महाविद्या मंदिर
- बाबाधाम और बजरंगबली मंदिर
- शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर
माँ का दिव्य और अलौकिक स्वरूप
मंदिर के गर्भगृह में स्थापित माँ की प्रतिमा अत्यंत प्रभावशाली है। माँ काली के इस स्वरूप में वे दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर लिए हुए हैं।
- अंकित स्वरूप: शिलाखंड पर माँ की तीन आंखें हैं और वे कमल के पुष्प पर खड़ी हैं। उनके चरणों के नीचे कामदेव और रति शयनावस्था में अंकित हैं।
- आभूषण: देवी का गला सर्पमाला और मुंडमाल से सुशोभित है।
- जया और विजया: माँ के अगल-बगल उनकी सहचरियां डाकिनी और शाकिनी (जया और विजया) खड़ी हैं, जिन्हें माँ अपने रक्त से तृप्त कर रही हैं।
पौराणिक कथा: माँ ने क्यों काटा अपना सिर?
देवी द्वारा अपना शीश काटने के पीछे एक करुणा और त्याग की कथा प्रचलित है:
सहचरियों की भूख
एक बार माँ भगवती अपनी सखियों जया और विजया के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान कर रही थीं। स्नान के पश्चात उनकी सहचरियों को तीव्र भूख लगी और वे भूख से व्याकुल होने लगीं।
माँ का परम त्याग
सखियों की व्याकुलता और याचना सुनकर माँ ने धैर्य रखने को कहा, लेकिन भूख की पीड़ा बढ़ती गई। अपनी संतानों के समान सखियों की भूख मिटाने के लिए माँ ने तत्काल खड्ग से अपना सिर काट लिया।
छिन्नमस्तिका का प्रादुर्भाव
सिर कटते ही रक्त की तीन धाराएं निकलीं। दो धाराओं से जया और विजया ने अपनी भूख शांत की और तीसरी धारा से माँ ने स्वयं रक्तपान किया। इसी अलौकिक घटना के बाद माँ का नाम 'छिन्नमस्तिका' पड़ा।
निष्कर्ष
रजरप्पा का छिन्नमस्तिका मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि त्याग और शक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक है। नदियों के संगम पर स्थित यह सिद्ध पीठ भक्तों को आध्यात्मिक शांति और सुरक्षा का अनुभव कराती है।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
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