
1275
चालीसा
संतोषी चालीसा का पाठ करने से माता संतोषी प्रसन्न होती हैं, सभी बाधाएँ दूर होती हैं, और जीवन में शांति, समृद्धि तथा संतोष की प्राप्ति होती है। इस चालीसा का नियमित पाठ मन को स्थिर करता है, जीवन में संतुलन लाता है और देवी माँ की कृपा से सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
सनातन धर्म में संतोषी माता का स्थान अत्यंत विशेष माना गया है। ऐसा माना जाता है कि संतोषी माता भगवान गणेश की कन्या और रिद्धि-सिद्धि की पुत्री हैं। जो भक्त हर शुक्रवार को माता की आराधना और चालीसा का पाठ करते हैं, उन्हें जीवन में अपार शांति, समृद्धि और संतोष की प्राप्ति होती है। संतोषी माता चालीसा के पाठ से दुख, दरिद्रता और संकटों का नाश होता है और जीवन सुख-शांति से भर जाता है।
संतोषी माता की कृपा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित पारंपरिक विधि का पालन करें:
बंदौं संतोषी चरण, रिद्धि-सिद्धि दातार।
ध्यान धरत ही होत नर, दुख सागर से पार॥
भक्तों को संतोष दे, संतोषी तव नाम।
कृपा करहु जगदम्बा, अब आया तेरे धाम॥
जय संतोषी माता अनुपम। शांति दायिनी रूप मनोरम॥
सुंदर वर्ण चतुर्भुज रूप। वेश मनोहर ललित अनुप॥
श्वेताम्बर रूप मनहारी। माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी॥
दिव्य स्वरूप आयत लोचन। दर्शन से हो संकट मोचन॥
जय गणेश की सुत भवानी। रिद्धि-सिद्धि की पुत्री ज्ञानी॥
अगम अगोचर तुम्हारी माया। सब पर करो कृपा की छाया॥
नाम अनेक तुम्हारे माता। अखिल विश्व है तुमको ध्याता॥
तुमने रूप अनेकों धरे। को कहि सके चरित्र तुम्हारे॥
धाम अनेकों कहां तक कहिए। सुमिरन कर सुख सब लहिए॥
विंध्याचल में विंध्यवासिनी। कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी॥
कलकत्ते में तू ही काली। दुष्ट नाशिनी महाकाली॥
संभलपुर बहुचरा कहाती। भक्तजनन का दुख मिटाती॥
ज्वाला जी में ज्वाला देवी। पूजत नित्य भक्त जन सेवी॥
नगर बंबई की महारानी। महालक्ष्मी तुम कल्याणी॥
मदुरा में मीनाक्षी तुम हो। सुख-दुख सबकी साक्षी तुम हो॥
राजनगर में तुम जगदम्बे। बनी भद्रकाली तुम अम्बे॥
पावागढ़ में दुर्गा माता। अखिल विश्व तेरा यश गाता॥
काशीपुर अधीश्वरी माता। अन्नपूर्णा नाम सुहाता॥
सर्वानंद करो कल्याणी। तुम ही शारदा अमृतवाणी॥
तुम्हारी महिमा जल में थल में। दुख दरिद्र सब मिटे पल में॥
जेते ऋषि और मुनिशा। नारद देव और देवेशा॥
इस जगती के नर और नारी। ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी॥
जापर कृपा तुम्हारी होती। वह पाता भक्ति का मोती॥
दुख दरिद्र संकट मिट जाता। ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता॥
जो जन तुम्हारी महिमा गावे। ध्यान तुम्हारा कर सुख पावे॥
जो मन रखे शुद्ध भावना। उसकी पूर्ण करो कामना॥
कुमति निवारी सुमति की दात्री। जयति जयति माता जगधात्री॥
शुक्रवार का दिवस सुहावन। जो व्रत करे तुम्हारा पावन॥
गुड़ चने का भोग लगावे। कथा तुम्हारी सुने सुनावे॥
विधिवत पूजा करे तुम्हारी। फिर प्रसाद पावे शुभकारी॥
शक्ति सामर्थ्य हो जो धन को। दान-दक्षिणा दे विप्रन को॥
वे जगती के नर और नारी। मनवांछित फल पावे भारी॥
जो जन शरण तुम्हारी जावे। सो निश्चय भाव से तर जावे॥
तुम्हारो ध्यान कुमारी ध्यावे। निश्चय मनवांछित वर पावे॥
साध्वा पूजा करे तुम्हारी। अमर सुहागिन हो वे नारी॥
विधवा धर के ध्यान तुम्हारा। भवसागर से उतरे पारा॥
जयति जयति जय संकट हरनी। विघ्न विनाशन मंगल करनी॥
हम पर संकट है अति भारी। वेग खबर लो मात हमारी॥
संतोषी माता चालीसा का पाठ मन में स्थिरता, शांति और सुख-समृद्धि लाता है। जो भक्त सच्चे भाव से इसका पाठ करते हैं, विशेषकर शुक्रवार के दिन, वे जीवन में सुख, संतोष और समृद्धि का अनुभव करते हैं। गुड़-चना का भोग लगाकर शुद्ध मन और निष्ठा से माता की आराधना करने से माता की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
“ॐ संतोषी माता नमः” — माता संतोषी सभी भक्तों को शांति, समृद्धि और संतोष का आशीर्वाद प्रदान करें।
