महामृत्युञ्जय स्तोत्रम्

महामृत्युञ्जय स्तोत्रम्

महामृत्युञ्जय स्तोत्रम् भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। इसे मृत्यु, रोग और भय से मुक्ति के लिए पढ़ा जाता है। इस स्तोत्र में भगवान शिव का ‘त्र्यम्बक’ रूप वर्णित है, जो जीवन और मृत्यु के चक्र को नियंत्रित करने वाला माना जाता है। इसका नियमित पाठ करने से मानसिक शांति, स्वास्थ्य, लंबी आयु और आध्यात्मिक सुरक्षा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भक्त को संकटों और जीवन की कठिनाइयों से निपटने की शक्ति भी देता है।

 

रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १ ॥

नीलकण्ठं कालमूर्तिं कालज्ञं कालनाशनम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ २ ॥

नीलकण्ठं विरूपाक्षं निर्मलं निलयप्रदम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ३ ॥

वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ४ ॥

देवदेवं जगन्नाथं देवेशं वृषभध्वजम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ५ ॥

गङ्गाधरं महादेवं सर्वाभरणभूषितम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ६ ॥

त्र्यक्षं चतुर्भुजं शान्तं जटामकुटधारिणम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ७ ॥

भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं नागाभरणभूषितम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ८ ॥

अनन्तमव्ययं शान्तं अक्षमालाधरं हरम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ९ ॥

आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपददायिनम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १० ॥

अर्धनारीश्वरं देवं पार्वतीप्राणनायकम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ११ ॥

प्रलयस्थितिकर्तारमादिकर्तारमीश्वरम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १२ ॥

व्योमकेशं विरूपाक्षं चन्द्रार्धकृतशेखरम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १३ ॥

गङ्गाधरं शशिधरं शङ्करं शूलपाणिनम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १४ ॥

अनाथः परमानन्दं कैवल्यःपदगामिनम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १५ ॥

स्वर्गापवर्गदातारं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १६ ॥

कल्पायुर्देहि मे पुण्यं यावदायुररोगताम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १७ ॥

शिवेशानां महादेवं वामदेवं सदाशिवम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १८ ॥

उत्पत्तिस्थितिसंहारकर्तारमीश्वरं गुरुम् ।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १९ ॥

मार्कण्डेयकृतं स्तोत्रं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
तस्य मृत्युभयं नास्ति नाग्निचौरभयं क्वचित् ॥ २० ॥

शतावर्तं प्रकर्तव्यं सङ्कटे कष्टनाशनम् ।
शुचिर्भूत्वा पठेत् स्तोत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २१ ॥

मृत्युञ्जय महादेव त्राहि मां शरणागतम् ।
जन्ममृत्युजरारोगैः पीडितं कर्मबन्धनैः ॥ २२ ॥

तावकस्त्वद्गतः प्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड ।
इति विज्ञाप्य देवेशं त्र्यम्बकाख्यमनं जपेत् ॥ २३ ॥

नमः शिवाय साम्बाय हरये परमात्मने ।
प्रणतक्लेशनाशाय योगिनां पतये नमः ॥ २४ ॥


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

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