महाशिवरात्रि पूजा - सुबह से लेकर रात तक करें पूजा

महाशिवरात्रि पूजा - सुबह से लेकर रात तक करें पूजा

महाशिवरात्रि पूजा - सुबह से लेकर रात तक करें पूजा

  •  महाशिवरात्रि व्रत से एक दिन पहले मात्र एक समय भोजन करना चाहिए। यह व्रत के समय की जाने वाली एक सामान्य प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि, व्रत के दिन पाचन तन्त्र में कोई अपचित भोजन शेष न रहा गया हो।
  •  महाशिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर्म करने चाहिये। हो सकें तो इस दिन स्नान के जल में काले तिल डालने का सुझाव दिया गया है। यह मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन किए जाने वाले पवित्र स्नान से न केवल शरीर के साथ आत्मा का भी शुद्धिकरण भी हो जाता है। यदि सम्भव हो तो इस दिन गङ्गा स्नान करना चाहिए। गंगा या किसी पवित्र नदी का जल घर के पानी में डालकर भी स्नान किया जा सकता है।
  •  इस दिन स्नान के बाद भक्तगणों को एक दिवसीय उपवास करने तथा अगले दिन उसका पारण करने का संकल्प ग्रहण करना चाहिए। संकल्प ग्रहण के समय भक्तगण व्रत के समय दृढ़ रहने की प्रतिज्ञा करते हैं। बिना किसी विघ्न-व्यवधान के व्रत सम्पन्न करने हेतु भगवान शिव से आशीर्वाद की कामना करते हैं। ये व्रत उपवास अत्यन्त कठिन होते हैं तथा लोग इन्हें सफलतापूर्वक सम्पन्न करने हेतु व्रत से पूर्व दृण संकल्प करते हैं।
Mahashivrati Special Puja

महाशिवरात्रि पूजा - करें निर्जला व्रत

  •  उपवास के समय भक्तों को सभी प्रकार के भोजन से दूर रहना चाहिये। उपवास के एक अन्य कठिन रूप में जल की भी अनुमति नहीं है, इसे निर्जला व्रत कहा जाता है। यद्यपि, दिन के समय फलों एवं दुग्ध का सेवन करने का सुझाव दिया जाता है, जिसके पश्चात् रात्रिकाल तक कठिन उपवास का पालन किया जाना चाहिये। अन्य शब्दों में कहें तो, दिन के समय फल एवं दुग्ध का सेवन किया जा सकता है।
  • भक्तों को सन्ध्याकाल में पूजन करने एवं मन्दिर जाने से पूर्व पुनः स्नान करना चाहिये। यदि कोई मन्दिर जाने में सक्षम नहीं है, तो पूजन आदि गतिविधियाँ सम्पन्न करने हेतु अस्थायी शिवलिङ्ग का निर्माण किया जा सकता है। घर पर अभिषेक-पूजन करने हेतु मिट्टी के शिवलिङ्ग का निर्माण करके उसपर घृत लेपन कर प्रयोग किया जा सकता है।
  • महाशिवरात्रि की पूजा रात में की जाना चाहिए। रात्रिकाल में एक अथवा चार बार शिवरात्रि पूजा की जा सकती है। चार बार शिव पूजा करने के लिए सम्पूर्ण रात्रि की समयावधि को चार प्रहर के रूप में चार भागों में विभाजित किया जा सकता है। जो भक्त एक बार पूजा करना चाहते हैं, उन्हें मध्य रात्रि के समय पूजा करनी चाहिये।
  • पूजा विधि के अनुसार, भिन्न-भिन्न सामग्रियों द्वारा शिवलिङ्ग का अभिषेक करना चाहिये। अभिषेक हेतु प्रायः दुग्ध, गुलाब जल, चन्दन का लेप, दही, शहद, घी, चीनी तथा जल आदि सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। जो भक्तगण चार प्रहर की पूजा करते हैं, उन्हें अन्य सामग्रियों के अतिरिक्त प्रथम प्रहार में जलाभिषेक, द्वितीय प्रहार में दधि (दही) अभिषेक, तृतीय प्रहर में घृत (घी) अभिषेक तथा चतुर्थ प्रहर में शहद अर्थात मधु अभिषेक करना चाहिये।
  • अभिषेक अनुष्ठान के उपरान्त, शिवलिङ्ग को बिल्व पत्र की माला अर्पण की जाती है।
  •  शिवलिङ्ग पर चन्दन अर्पित किया जाता है तथा धूप-दीप आदि प्रज्वलित किये जाते हैं। भगवान शिव को सुसज्जित करने वाली अन्य सामग्रियों के रूप में मदार पुष्प, जिन्हें आक के रूप में भी जाना जाता है तथा विभूति, जिसे भस्म भी कहा जाता है आदि अर्पित की जाती हैं। विभूति एक पवित्र भस्म है, जो गाय के गोबर के कण्डों से बनती है।
  •  पूजा के समय ॐ नमः शिवाय मन्त्र का जप करना चाहिये।
  • भक्तों को अगले दिन स्नान करने के पश्चात् उपवास का पारण करना चाहिये। व्रत का अधिकतम लाभ प्राप्त करने हेतु भक्तों को सूर्योदय एवं चतुर्दशी तिथि के समापन से पूर्व के मध्य की समयावधि में उपवास खोलना चाहिये।
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लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

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