श्री मुरारि पञ्चरत्नम्

श्री मुरारि पञ्चरत्नम्

यत्सेवनेन पितृमातृसहोदराणां
चित्तं न मोहमहिमा मलिनं करोति ।
इत्थं समीक्ष्य तव भक्तजनान् मुरारे
मूकोऽस्मि तेऽङ्घ्रिकमलं तदतीव धन्यम् ॥ १ ॥

ये ये विलग्नमनसः सुखमाप्तुकामाः
ते ते भवन्ति जगदुद्भवमोहशून्याः ।
दृष्ट्वा विनष्टधनधान्यगृहान् मुरारे
मूकोऽस्मि तेऽङ्घ्रिकमलं तदतीव धन्यम् ॥ २ ॥

वस्त्राणि दिग्वलयमावसतिः श्मशाने
पात्रं कपालमपि मुण्डविभूषणानि ।
रुद्रे प्रसादमचलं तव वीक्ष्य शौरे
मूकोऽस्मि तेऽङ्घ्रिकमलं तदतीव धन्यम् ॥ ३ ॥

यत्कीर्तिगायनपरस्य विधातृसूनोः
कौपीनमैणमजिनं विपुलां विभूतिम् ।
स्वस्यार्थ दिग्भ्रमणमीक्ष्य तु सार्वकालं
मूकोऽस्मि तेऽङ्घ्रिकमलं तदतीव धन्यम् ॥ ४ ॥

यद्वीक्षणे धृतधियामशनं फलादि
वासोऽपि निर्जिनवने गिरिकन्दरासु ।
वासांसि वल्कलमयानि विलोक्य चैवं
मूकोऽस्मि तेऽङ्घ्रिकमलं तदतीव धन्यम् ॥ ५ ॥

स्तोत्रं पादाम्बुजस्यैतच्छ्रीशस्य विजितेन्द्रियः ।
पठित्वा तत्पदं याति श्लोकार्थज्ञस्तु यो नरः ॥ ६ ॥

इति श्री मुरारि पञ्चरत्नम् ॥


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