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मंत्र
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, नन्दीकेश्वराय धीमहि, तन्नो वृषभः प्रचोदयात्।
अर्थ: हम उस परम पुरुष, नन्दीकेश्वर का ध्यान करते हैं, जो सत्य और शक्ति के प्रतीक हैं। वे हमारे बुद्धि को धर्म के मार्ग पर प्रेरित करें और हमें शिवतत्व की ओर अग्रसर करें।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो नन्दिः प्रचोदयात्।
अर्थ: मैं नन्दीकेश्वर का ध्यान करता हूँ जो कैलाश के रक्षक और शिवभक्तों के मार्गदर्शक हैं। वे हमारे विचारों को शुद्ध करें, अज्ञान को दूर करें और दिव्य ज्ञान प्रदान करें।
ॐ शिववाहनाय विद्महे तुण्डाय धीमहि, तन्नो नन्दिः प्रचोदयात्!
अर्थ: हे भगवान् नन्दी, जो भगवान् शिव के वाहन हैं, मुझे बल, श्रद्धा और भक्ति प्रदान करें। मेरे सभी दुःखों और बाधाओं को दूर कर मुझे मोक्ष के पथ पर ले चलें।
भवेशं भवेशानम ईड्यं सुरेशं विभुं विश्वनाथं भवानीसमार्द्रं श्रच्छन्द्र गात्रं सुधापूर्ण नेत्रं भजे नन्दीकेश्वरं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ १ ॥
अर्थ: हे नन्दीकेश्वर! आप समस्त लोकों के रक्षक हैं, जो दुःख और दरिद्रता का नाश करते हैं। आपका रूप पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान तेजस्वी है और आपकी दृष्टि अमृत से परिपूर्ण है। मैं आपकी स्तुति करता हूँ।
हिमाद्रौ निवासं स्फुरच्चन्द्रचूडं विभूति दधानं महानीलकण्ठं प्रभुं दिग्भुजं शूलतङ्कायुधाध्यं भजे नन्दीकेश्वरं दरिद्रार्तिनाशम् ॥ २ ॥
अर्थ: मैं उन नन्दीकेश्वर का ध्यान करता हूँ जो हिमालय में निवास करते हैं, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित है और शरीर पर पवित्र भस्म लगी है। जिनका कण्ठ नीलवर्ण है और जिनके हाथों में त्रिशूल तथा खड्ग जैसे दिव्य आयुध हैं। वे सम्पूर्ण दुःखों का नाश करें।
नन्दी जी भगवान शिव के परम भक्त, द्वारपाल तथा वाहन माने जाते हैं। वे भक्ति, निष्ठा और पवित्रता के प्रतीक हैं। कहा जाता है कि नन्दी जी भक्तों की इच्छाओं को भगवान शिव तक पहुँचाते हैं। समुद्र मंथन के समय जब भगवान शिव ने संसार की रक्षा हेतु विषपान किया, तब जो विष की एक बूँद धरती पर गिरी, नन्दी जी ने अपनी जिह्वा से उसे ग्रहण कर पृथ्वी की रक्षा की। इसी कारण नन्दी जी को शिवभक्तों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वे शिव के प्रथम शिष्य तथा अठारह सिद्धरों के गुरु माने जाते हैं, जिनमें पतंजलि, व्याघ्रपाद और तिरुमूलर प्रमुख हैं। प्रत्येक शिव मंदिर में नन्दी की प्रतिमा शिवलिंग के सम्मुख स्थापित होती है, क्योंकि माना जाता है कि हर प्रार्थना नन्दी जी के माध्यम से शिव तक पहुँचती है।
प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार ऋषि शिलाद ने अमर और शिवकृपाप्राप्त पुत्र की प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें नन्दी के रूप में पुत्र प्रदान किया। जब मुनियों ने बताया कि नन्दी का जीवन अल्प होगा, तब नन्दी ने शिव की उपासना आरम्भ की। उनकी अखण्ड भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और उन्हें अमरत्व का वरदान दिया। उसी समय नन्दी को भगवान शिव का वाहन, द्वारपाल और परम सेवक बनाया गया। तब से नन्दी जी शिव के साथ सदा उपस्थित रहते हैं और भक्तों की प्रार्थनाएँ उन्हीं के माध्यम से शिव तक पहुँचती हैं।
इस मन्त्र के जप से भगवान शिव की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।
जीवन की सभी बाधाएँ, भय और संकट दूर होते हैं।
घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
आध्यात्मिक ज्ञान, एकाग्रता और आत्मबल की वृद्धि होती है।
ग्रहदोष और नकारात्मक ऊर्जाएँ समाप्त होती हैं।
व्यवसाय, कार्य और संबंधों में सफलता मिलती है।
शत्रु, ईर्ष्या और अदृश्य बाधाओं से रक्षा होती है।
संतान की प्राप्ति और पारिवारिक सुख की वृद्धि होती है।
प्रतिदिन नन्दी मन्त्र के साथ शिव चालीसा का पाठ करने से शीघ्र फल प्राप्त होते हैं।
मन्त्र जप से मन की अशुद्धियाँ मिटती हैं और भक्ति दृढ़ होती है।
