
निर्जला एकादशी कब और क्यों मनाई जाती है, आइए इसके महत्व को समझें

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ज्योतिष
निर्जला एकादशी कब और क्यों मनाई जाती है, आइए इसके महत्व को समझे
वैसे तो साल में हर महीने मे दो एकादशी आती है । निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) सबसे महत्वपूर्ण और लाभकारी एकादशी मानी जाती है। इसका संबंध भगवान विष्णु से है। इस दिन श्रद्धालु भगवान को प्रसन्न करने के लिए 24 घंटे का उपवास रखा जाता है। निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) को सभी एकादशियों में सबसे कठिन व्रत माना जाता है। ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष तिथि को आने वाली एकादशी को निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) कहते है। जैसा कि इसका नाम है, वैसा ही इसका व्रत रहता है। यह व्रत निर्जल करना होता है। यदि आप पूरे साल एकादशी का व्रत नहीं कर सकते हैं, तो इस एकादशी (Nirjala Ekadashi)पर निर्जल व्रत कर सकते हैं। जिससे आपको 24 एकादशी का फल एक साथ प्राप्त होगा। धार्मिक शास्त्रों मे इसे भीमसेन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है ।
निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) तिथि मुहूर्त 2025
- निर्जला एकादशी: शुक्रवार, जून 6, 2025
- पारण का समय: 7वाँ जून को 02:00 पी एम से 04:42 पी एम
- एकादशी तिथि प्रारंभ: जून 06, 2025 को 02:15 ए एम बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: जून 07, 2025 को 04:47 ए एम बजे
कैसे करें निर्जला एकादशी पूजा
निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) के दिन सुबह जल्दी उठ जाएं । उठने के पश्चात शुद्ध जल से स्नान करे स्नान करने के पश्चात स्वच्छ वस्त्र पहनें। घर की भी साफ सफाई करें। व्रत करने वाले लोग एकादशी के दिन सूर्योदय के समय से पूजा करने के लिये भगवान विष्णु की प्रतिमूर्ति स्थापित करें। जल चढ़ाएं। साथ ही कुमकुम ,चावल, पुष्प वस्त्र आदि भगवान को अर्पण करें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। विधि -विधान से पूजा करने के पश्चात आरती करें। इस दिन ब्राह्मण भोजन का भी विशेष महत्व है।
निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) महत्व
हिंदू कैलेंडर का ग्यारहवां दिन एकादशी कहा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार हर माह दो पक्ष में बंटा होता है। पहला शुक्ल पक्ष व दूसरा कृष्ण पक्ष। दोनों पक्ष का ग्यारहवां दिन एकादशी होता है। यह भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। एकादशी ग्यारह इंद्रियों का प्रतीक है, इसमें पांच अनुभूत इंद्रियां, पांच कार्य इंद्रियां और एक मस्तिष्क होता है।
शास्त्रों मे हर एक एकादशी के व्रत का महत्व है । कहा जाता है की निर्जला एकादशी का व्रत अगर कोई भी व्यक्ति करता है तो उसका फल उसे 24 एकादशी व्रत करने के बराबर मिलता है। इस दिन जल से भरे कलश का दान करने वाले श्रद्धालुओं को साल भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। अगर आप साल भर की एकादशी करते है और गलती से किसी एकादशी मे अन्न खा लेते है । तो इस एकादशी (Nirjala Ekadashi) का व्रत करने से अन्य एकादशियों का दोष समाप्त जाता है । इस दिन (Nirjala Ekadashi) निर्जल रहकर भगवान विष्णु की अराधना करनी चाहिए क्योंकि एकादशी का दिन भगवान विष्णु को बहुत ही ज्यादा प्रिय होता है। इसलिए निर्जला एकादशी पर (Nirjala Ekadashi) निर्जल व्रत रहने से भगवान श्री हरि विष्णु जी आपके ऊपर विशेष कृपा बरसाते है ।
एकादशी के कितने प्रकार होते हैं
कुल मिलाकर 24 एकादशी होती है। हर एकादशी भगवान विष्णु के अवतार से जुड़ी है। हर एकादशी का अपना अलग महत्व है और पूजन का अपना तरीका है।
निर्जला एकादशी के लाभ
- निम्नलिखित लाभ के लिए निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) की जा सकती है:
आध्यात्मिक वृद्धि
- सफलता, समृद्धि और स्वास्थ्य लाभ
- भगवान विष्णु का आशीर्वाद
- कामनापूर्ति
- पुराने पापों की समाप्ति
- रोजगार में उन्नति
- परिवार में खुशी
निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) कथा
एक बार भीमसेन जी महर्षि व्यासजी से कहते है कि हे पितामह ! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव यह सब मुझे एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, लेकिन मैं उन सभी से कहता हुं कि भाई मैं भगवान की पूजा तो कर लेता हूँ, दान भी कर सकता हूँ लेकिन भोजन ग्रहण किए बिना नहीं रह सकता।
यह सुनकर महर्षि व्यासजी कहते है । भीमसेन अगर तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा मानते हो तो हर महीने की दोनों एकादशियों को अन्न ग्रहण मत किया करो। तभी भीमराज कहते है की महर्षि ! मैं तो आपको पहले ही कह चुका हूँ कि मैं बिना खाए नहीं रह सकता । लेकिन साल में अगर कोई एक ही व्रत आए तो ऐसा व्रत मे रख सकता हूँ। मैं चाहता हूं कि आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताएं जो साल में सिर्फ एक बार ही मुझे करना पड़े और मुझे स्वर्ग लोक की प्राप्ति हो जाएं । तभी महर्षि व्यासजी कहते है कि ऋषियों ने मिलकर शास्त्र बनाए हैं जिनके द्वारा थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है।
जब भीमसेन नरक में जाने की बात महर्षि व्यासजी के मुह से सुनते है तो वह भयभीत हो जाते है और डरकर कहते है कि मै महीने मे दो व्रत नहीं कर सकता हु , लेकिन साल में एक व्रत करने की कोशिश जरूर कर पाउगा । आप मुझे ऐसा कोई व्रत बताओ जो साल मे एक बार कर सकू और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो।
तभी महर्षि व्यास भीमसेन को कहते है वृषभ और मिथुन की संक्रांति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष मे जो एकादशी पड़ती है, वह निर्जला नाम से जानी जाती है। तुम उस एकादशी के व्रत को कर सकते हो । इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के अलावा जल नहीं पिया जा सकता है। भोजन भी बिल्कुल ग्रहण नहीं कर सकते । इस एकादशी (Nirjala Ekadashi) के व्रत का फल 24 एकादशी के फल मिलने के बराबर होता है । महर्षि कहते है कि यह व्रत भगवान ने खुद उन्हें बताया था।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।