
ज्योतिष के अनुसार कैसे अस्तित्व में आए नवग्रह ?

1299

ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों का विशेष स्थान है। इनमें सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु शामिल हैं। इन ग्रहों में सूर्य को राजा, मंगल को सेनापति, गुरु को ज्ञान का कारक और शनि को न्यायधीश माना गया है। आइए जानते हैं इन ग्रहों के जन्म से जुड़ी अद्भुत पौराणिक कहानियाँ।
1. सूर्य देव: कश्यप और अदिति के पुत्र
हिंदू संस्कृति में सूर्य देव को महर्षि कश्यप और माता अदिति का पुत्र माना जाता है। जब असुरों ने देवताओं को पराजित कर दिया, तब अदिति ने सूर्य देव से प्रार्थना की कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेकर धर्म की रक्षा करें।
- प्रतीक: सूर्य देव जीवन, शक्ति और प्राण के स्रोत हैं।
- मान्यता: वे सात घोड़ों वाले रथ में सवार होकर ब्रह्मांड की ऊर्जा संचालित करते हैं। पश्चिमी सभ्यता में इन्हें 'अपोलो' के नाम से जाना जाता है।
2. चंद्र देव: अत्रि ऋषि की संतान
हरिवंश पुराण के अनुसार, चंद्र देव ऋषि अत्रि के पुत्र हैं। उनका विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं (नक्षत्रों) से हुआ था।
- पौराणिक कथा: चंद्रमा का रोहिणी के प्रति विशेष लगाव देख दक्ष ने उन्हें क्षय होने का श्राप दिया था। तब भगवान शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर उनके प्राणों की रक्षा की।
3. मंगल देव: पृथ्वी के पुत्र (भूमिपुत्र)
मंगल देव को 'भौम' भी कहा जाता है क्योंकि वे धरती माता के पुत्र हैं।
- उत्पत्ति: एक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकाला, तब पृथ्वी की इच्छा पर मंगल का जन्म हुआ। अन्य मत के अनुसार, वे भगवान शिव के पसीने की बूंद से उत्पन्न हुए हैं।
4. बुध देव: चंद्रमा और तारा के पुत्र
बुध देव के जन्म की कथा काफी रोचक है। वे चंद्रमा और देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा की संतान हैं।
- कथा: बुध के जन्म के बाद चंद्रमा और बृहस्पति दोनों ने उन्हें अपना पुत्र माना, लेकिन अंततः तारा ने स्पष्ट किया कि चंद्रमा ही उनके वास्तविक पिता हैं। बुध को बुद्धि का अधिष्ठाता देव माना जाता है।
5. बृहस्पति देव: देवताओं के गुरु
बृहस्पति देव महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं। वे बुद्धि और अपार ज्ञान के स्वामी हैं।
- शिव भक्ति: बृहस्पति भगवान शिव के परम शिष्य बने। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर शिव जी ने उन्हें देवगुरु की पदवी और ग्रह मंडल में स्थान दिया।
6. शुक्र देव: दानवों के गुरु
शुक्राचार्य महर्षि भृगु के पुत्र हैं। वे प्रेम, सौंदर्य और सुख-सुविधाओं के देवता माने जाते हैं।
- मृत-संजीवनी विद्या: शुक्र देव ही एकमात्र ऐसे ऋषि थे जिन्हें भगवान शिव ने मृत को जीवित करने वाली विद्या प्रदान की। इन्हें महालक्ष्मी का स्वरूप भी माना जाता है।
7. शनि देव: न्याय के देवता
शनि देव सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। उन्हें सौरमंडल का 'न्यायधीश' कहा जाता है।
- महत्व: शनि देव कर्मों के अनुसार फल देते हैं। भगवान शिव और कृष्ण के भक्त शनि देव वैराग्य और आध्यात्मिकता के भी प्रतीक हैं।
8. राहु और केतु: समुद्र मंथन का रहस्य
राहु और केतु का जन्म समुद्र मंथन के दौरान हुआ था। स्वरभानू नामक असुर ने छल से अमृत पी लिया था, जिसे पहचानकर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया।
- राहु: असुर का कटा हुआ सिर राहु कहलाया, जिसकी देखभाल माता सिंहिका ने की।
- केतु: धड़ वाला हिस्सा केतु बना। भगवान शिव ने इन्हें छाया ग्रह का दर्जा दिया। इन्हें ग्रहण का कारक भी माना जाता है।
निष्कर्ष
नवग्रहों का यह अस्तित्व हमें सिखाता है कि हर ग्रह का अपना एक स्वभाव और ब्रह्मांडीय उत्तरदायित्व है। इन ग्रहों की स्थिति हमारे जीवन की दिशा और दशा निर्धारित करती है।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।