पञ्चाक्षरमन्त्रगर्भ स्तोत्रम्

पञ्चाक्षरमन्त्रगर्भ स्तोत्रम्

दुष्टतमोऽपि दयारहितोऽपि
विधर्मविशेषकृतिप्रथितोऽपि ।
दुर्जनसङ्गरतोऽप्यवरोऽपि
कृष्ण तवाऽस्मि न चाऽस्मि परस्य ॥ १ ॥

लोभरतोऽप्यभिमानयुतोऽपि
परहितकारणकृत्यकरोऽपि ।
क्रोधपरोऽप्यविवेकहतोऽपि
कृष्ण तवाऽस्मि न चाऽस्मि परस्य ॥ २ ॥

काममयोऽपि गताश्रयणोऽपि
पराश्रयगाशयचञ्चलितोऽपि ।
वैषयिकादरसंवलितोऽपि
कृष्ण तवाऽस्मि न चाऽस्मि परस्य ॥ ३ ॥

उत्तमधैर्यविभिन्नतरोऽपि
निजोदरपोषणहेतुपरोऽपि ।
स्वीकृतमत्सरमोहमदोऽपि
कृष्ण तवाऽस्मि न चाऽस्मि परस्य ॥ ४ ॥

भक्तिपथादरमात्रकृतोऽपि
व्यर्थविरुद्धकृतिप्रसृतोऽपि ।
त्वत्पदसन्मुखतापतितोऽपि
कृष्ण तवाऽस्मि न चाऽस्मि परस्य ॥ ५ ॥

संसृतिगेहकलत्ररतोऽपि
व्यर्थधनार्जनखेदसहोऽपि ।
उन्मदमानससंश्रयणोऽपि
कृष्ण तवाऽस्मि न चाऽस्मि परस्य ॥ ६ ॥

कृष्णपथेतरधर्मरतोऽपि
स्वस्थितविस्मृतिसद्धृदयोऽपि ।
दुर्जनदुर्वचनादरणोऽपि
कृष्ण तवाऽस्मि न चाऽस्मि परस्य ॥ ७ ॥

वल्लभवंशजनुः सबलोऽपि
स्वप्रभुपादसरोजफलोऽपि ।
लौकिकवैदिकधर्मखलोऽपि
कृष्ण तवाऽस्मि न चाऽस्मि परस्य ॥ ८ ॥

पञ्चाक्षरमहामन्त्रगर्भितस्तोत्रपाठतः ।
श्रीमदाचार्यदासानां तदीयत्वं भवेद्ध्रुवम् ॥ ९ ॥

इति श्रीहरिदास कृतं पञ्चाक्षरमन्त्रगर्भ स्तोत्रम् ।


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

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