
परिवर्तिनी एकादशी - भगवान विष्णु का करवट बदलना

1263

पूजा
परिवर्तिनी एकादशी - भगवान विष्णु का करवट बदलना
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु अपनी चार महीने की योगनिद्रा में करवट बदलते हैं। यही कारण है कि इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी को जलझूलनी एकादशी, पार्श्व एकादशी और वामन एकादशी भी कहते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
परिवर्तिनी एकादशी का महत्व
हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आती है और उसके कष्ट दूर होते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा की जाती है। कहते हैं कि जो व्यक्ति सच्चे मन से यह व्रत करता है। उसे वाजपेय यज्ञ के बराबर फल मिलता है। यह व्रत करने से भगवान विष्णु के साथ-साथ माता लक्ष्मी का भी आशीर्वाद मिलता है। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है.
पूजा विधि और व्रत कथा
पूजा विधि:
- परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें।
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाएं और व्रत का संकल्प लें।
- भगवान विष्णु को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से स्नान कराएं।
- उन्हें पीले फूल, चंदन, तुलसी के पत्ते और मिठाई अर्पित करें।
- विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें।
- दिनभर निराहार रहें और शाम को पूजा के बाद फलाहार कर सकते हैं।
- अगले दिन यानी द्वादशी को सुबह पूजा के बाद व्रत का पारण करें।
व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में एक राजा थे जिनका नाम बलि था। वे बहुत ही पराक्रमी और दानी थे, लेकिन अहंकार के कारण उन्होंने इंद्रलोक पर भी अधिकार कर लिया था। देवराज इंद्र और अन्य देवता भगवान विष्णु के पास गए और उनसे मदद मांगी। तब भगवान विष्णु ने वामन रूप में अवतार लिया और राजा बलि के पास गए। भगवान वामन ने राजा बलि से दान में तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने दान देने का वचन दिया. इसके बाद भगवान वामन ने अपना विराट रूप धारण किया और एक पग में पूरी पृथ्वी, दूसरे पग में पूरा आकाश नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची, तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान वामन ने राजा बलि के सिर पर अपना तीसरा पग रखा और उन्हें पाताल लोक भेज दिया। भगवान वामन राजा बलि की दानशीलता से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे उनके द्वारपाल बनकर रहेंगे।
भगवान विष्णु और वामन के कुछ मंत्र
- 1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय,
- 2. ॐ विष्णवे नमः,
- 3. ॐ नारायणाय नमः,
4. ॐ नमो नारायणाय,
- ॐ विक्रमाय विद्महे, विश्वरूपाय धीमहि, तन्नो वामन प्रचोदयात्।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।