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कई मान्यताओं के अनुसार हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा पितृ लोक जाती है। कुछ और पौराणिक कथाएं कहती हैं कि जिन लोगों ने अच्छे कर्म किए हैं, वे पितृ के रूप में पितृ लोक में वास करते हैं। पितृ एक तरह से देवों की श्रेणी के हमारे पूर्वज हैं, जो हमें समस्त सुख और वैभव का आशीर्वाद देते हैं। सनातन धर्म में मनुष्य पर तीन तरह के ऋण माने गये है, जिनमे पितृ ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण शामिल हैं। इनमें भी पितृ ऋण को सबसे बड़ा माना गया है। पितृों के ऋण से उतरने का सबसे आसान तरीका माना जाता है पितृ पक्ष में पितृों के लिए तर्पण, श्राद्ध और दान। हर साल पितृ पक्ष का त्यौहार 16 दिन तक विशेष रूप से मनाया जाता है। इस साल यानी 2024 में पितृ पक्ष 17 सितंबर से शुरू होकर 2 अक्टूबर तक मनाया जाएगा।
हिंदू माह कैलेंडर के अनुसार आश्विन माह की कृष्ण प्रतिपदा से सर्वपितृ अमावस्या तक पितृ यानी हमारे पूर्वज अपना लोकर छोड़कर पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं। यह अवधि 15-16 दिन की होती है। लोग अपने पूर्वजों के देह छोड़ने की तिथि पर उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और ब्राह्मण भोजन या दान का आयोजन करते हैं। कहते हैं इससे पूर्वज संतुष्ट होते हैं और अपने बच्चों को सुख, संपत्ति, धन, वैभव और संतान का आशीर्वाद देते हैं। पूर्वज इस विशेष पूजा का ग्रहण करके दोबारा पितृ लोक लौट जाते हैं और सालभर तक बच्चों को सुखी जीवन का आशीर्वाद देकर जाते हैं।
वैसे तो प्रत्येक अमावस्यो को पितृों की तिथि मानी गई हैं। प्रत्येक घरों में अमावस्या पर पितृों के लिए दान का आयोजन होता है, लेकिन यदि कोई दैनिक दिनचर्या में व्यस्त होकर अमावस्या पर तर्पण या दान करना भूल जाता है, तो पुराणो में इसके लिए सोलह दिनों का विशेष काल निर्धारित किया गया है। श्राद्ध के दौरान मांगलिक कार्य नहीं होते हैं, लेकिन इस दौरान श्राद्ध, तर्पण, ब्राह्मण भोजन और दान का संस्कार किया जा सकता है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, वे भी इस दौरान विशेष अनुष्ठान और पूजा करवा सकते हैं। इस दौरान की गई पूजा आपको पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है।
पितृ पक्ष के दौरान अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथि के दिन आप सुबह से श्राद्ध पूजा के आयोजन की तैयारी कर सकते हैं। आप मानकर चल सकते हैं कि इस दौरान पितृ आपके घर आएंगे। दरवाजों को वंदनवार से सजाएं और ब्राह्मण भोजन का आयोजन करें। इस दौरान अपने खाने में प्याज और लहसून का इस्तेमाल ना करें। पितृ पक्ष के भोजन में खीर या दूध से बनी मिठाइयों का महत्व अधिक है। साथ ही चावल के विशेष व्यंजन भी आप बना सकते हैं। पितृ पूजा हमेशा दोपहर 12 बजे बाद ही होना चाहिए। इस दौरान घर में पितृों के निमित्त तर्पण करें। गाय, कौए और श्वान(कुत्तों) के लिए भी भोजन निकालें। कहा जाता है कि कई बार पितृ इन पशु-पक्षियों के रूप में आकर भी अपने बच्चों की परीक्षा करते हैं। पितृों के निमित्त धूप-दीप नैवैद्य लगाएं। घर आएं ब्राह्मण या गरीब व्यक्ति को भोजन करवाएं और उन्हें दान करें। पितृों से आशीर्वाद मांगें।
पितृ पक्ष में इस तरह श्राद्ध या पूजा करने से आपको पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है, पितृों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कहते हैं पितृों का आशीर्वाद दशा और दिशा दोनों बदल सकते हैं। यदि आप किसी गलत मार्ग पर जा रहे हैं, तो पितृों का आशीर्वाद आपके सन्मार्ग प्रदान करता है। और जीवन में आने वाली चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देता है। यदि पितृपक्ष के दौरान यह पूजा पूरी समर्पण से की जाएं, तो तो पूर्वज प्रसन्न होकर हमारे जीवन की मुश्किलें और परेशानियां को समाप्त कर सकते हैं।
पूर्णिमा का श्राद्ध - 17 सितंबर (मंगलवार)
प्रतिपदा का श्राद्ध - 18 सितंबर (बुधवार)
द्वितीया का श्राद्ध - 19 सितंबर (गुरुवार)
तृतीया का श्राद्ध - 20 सितंबर (शुक्रवार)
चतुर्थी का श्राद्ध - 21 सितंबर (शनिवार)
महा भरणी - 21 सितंबर (शनिवार)
पंचमी का श्राद्ध - 22 सितंबर (रविवार)
षष्ठी का श्राद्ध - 23 सितंबर (सोमवार)
सप्तमी का श्राद्ध - 23 सितंबर (सोमवार)
अष्टमी का श्राद्ध - 24 सितंबर (मंगलवार)
नवमी का श्राद्ध - 25 सितंबर (बुधवार)
दशमी का श्राद्ध - 26 सितंबर (गुरुवार)
एकादशी का श्राद्ध - 27 सितंबर (शुक्रवार)
द्वादशी का श्राद्ध - 29 सितंबर (रविवार)
मघा श्राद्ध - 29 सितंबर (रविवार)
त्रयोदशी का श्राद्ध - 30 सितंबर सोमवार)
चतुर्दशी का श्राद्ध - 1 अक्टूबर (मंगलवार)
सर्वपितृ अमावस्या - 2 अक्टूबर (बुधवार)
