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मंत्र
ॐ पृथ्वीदेवयै विद्महे सहस्रमूर्त्यै धीमहि तन्नः पृथ्वी प्रचोदयात्
अर्थ: "हे माता पृथ्वी, अनगिनत रूपों वाली देवी, हमें ज्ञान और शक्ति प्रदान करें। आपकी दिव्य ऊर्जा हमें सद्मार्ग पर प्रेरित करे।"
ॐ पृथ्विदेवयै विद्महे धराभृत्यै धीमहि तन्नः पृथ्वी प्रचोदयात्
अर्थ: "हे माता पृथ्वी, जो सम्पूर्ण सृष्टि का भार वहन करती हैं, मैं आपको नमन करता हूँ। मेरे कष्टों का नाश करें और मुझे शांति, स्थिरता व समृद्धि प्रदान करें।"
ॐ समुद्र वसने देवि पर्वतस्तन मण्डिते। विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे॥
अर्थ: "हे माता पृथ्वी, जो समुद्र को वस्त्र रूप में धारण करती हैं और पर्वतों से अलंकृत हैं, मैं प्रतिदिन आपके पवित्र शरीर का पादस्पर्श करने के लिए क्षमा चाहता हूँ।"
'पृथ्वी' शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है – "धरती" या "माता धरती"। ऋग्वेद में पृथ्वी को द्यौष्पितृ (आकाश देवता) की पत्नी कहा गया है और दोनों को मिलाकर द्यावापृथ्वी कहा जाता है। वे जीवन की आधारशिला हैं और अग्नि, इन्द्र तथा उषा जैसे देवता भी उनकी संतान माने गए हैं। पृथ्वी गायत्री मंत्र को माता पृथ्वी को समर्पित सबसे शक्तिशाली मंत्र माना गया है, जो शांति, स्थिरता और समृद्धि प्रदान करता है। सनातन धर्म में हर शुभ कार्य की शुरुआत माता पृथ्वी की पूजा से होती है — चाहे घर की नींव डालना हो या खेत में बीज बोना। वे धैर्य, करुणा और संतुलन का प्रतीक हैं। जो भी श्रद्धा से पृथ्वी माता का पूजन करता है, उसे जीवन में स्थिरता, शक्ति और संरक्षण प्राप्त होता है।
प्राचीन काल से ही यह परंपरा रही है कि व्यक्ति सुबह उठते ही धरती को छूकर फिर हाथ मस्तक पर लगाता है। यह कृतज्ञता और विनम्रता का प्रतीक है। हमारे शरीर के पंचतत्व भी पृथ्वी से ही निर्मित हैं। माता पृथ्वी हमें भोजन, जल, औषधियाँ, फल, पुष्प और आश्रय देती हैं। इसलिए उन्हें नमस्कार करना हमारा धर्म है। पुराणों में कहा गया है कि जो व्यक्ति माता पृथ्वी का सम्मान करता है और उनके मंत्र का जप करता है, उसके जीवन में कभी अभाव या अस्थिरता नहीं आती।
नियमित रूप से पृथ्वी मंत्र का जप करने से मन में शांति, स्थिरता और आत्मविश्वास आता है। यह व्यक्ति को मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करता है। किसान बीज बोने से पहले माता पृथ्वी की पूजा करते हैं ताकि फसल उत्तम हो। भवन निर्माण के समय भी माता पृथ्वी की आराधना की जाती है ताकि निर्माण मजबूत और दीर्घायु हो।
यह मंत्र अहंकार, क्रोध और नकारात्मकता को दूर करता है तथा व्यक्ति के भीतर विनम्रता और करुणा भरता है। निरंतर जप से पुरानी बीमारियाँ दूर होती हैं और मन व शरीर स्वस्थ रहते हैं। यह मंत्र निर्णय क्षमता को बढ़ाता है, आत्मविश्वास देता है और जीवन में स्थिरता लाता है। साथ ही यह प्राकृतिक आपदाओं और दुर्भाग्य से भी रक्षा करता है।
पृथ्वी मंत्र साधक को माता पृथ्वी की पोषण और स्थिरता की ऊर्जा से जोड़ता है। यह मंत्र धैर्य, नम्रता और कृतज्ञता का भाव सिखाता है, जिससे जीवन में संतुलन और सुख की अनुभूति होती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन माता पृथ्वी का ध्यान करता है, उसे न केवल भौतिक समृद्धि बल्कि आध्यात्मिक शांति भी प्राप्त होती है। याद रखें – संपूर्ण जीवन माता पृथ्वी से उत्पन्न होकर उन्हीं में विलीन होता है, इसलिए पृथ्वी देवी की आराधना स्वयं अस्तित्व की पूजा है।
