
बच्चों की उन्नति के लिए साल की आखिरी एकादशी का व्रत जरूर करें

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पूजा
बच्चों की उन्नति के लिए साल की आखिरी एकादशी का व्रत जरूर करें
सनातन धर्म की परंपराओं में पौष मास का समय अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी माना गया है। यह पूरा महीना आत्मिक शुद्धि, जप, तप और दान-पुण्य के लिए विशेष रूप से अनुकूल होता है। इस शुभ अवधि में अनेक व्रत, पर्व और धार्मिक अनुष्ठान आते हैं, जो भक्तों को भगवान के करीब लाते हैं। इन सभी में पौष माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व शास्त्रों में सर्वोच्च बताया गया है। यह परम पावन तिथि सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु और धन-ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी को समर्पित है। ऐसी प्रबल मान्यता है कि जो दंपत्ती इस दिन श्रद्धा और भक्ति से उपवास रखते हैं, उन्हें संतान सुख, वंश की वृद्धि और घर-परिवार में शांति एवं समृद्धि का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह व्रत निःसंतान लोगों के लिए वरदान स्वरूप है और जिनकी संतानें हैं, उनके दीर्घायु और उज्जवल भविष्य की कामना के लिए भी अत्यंत फलदायी माना गया है।
पुत्रदा एकादशी का आध्यात्मिक और पारिवारिक महत्व
पौष पुत्रदा एकादशी का नाम ही इसके गहन उद्देश्य को स्पष्ट करता है – संतान प्रदान करने वाली एकादशी। यह पुण्यमयी एकादशी वर्ष में दो बार आती है। पहली पवित्र सावन मास के शुक्ल पक्ष में और दूसरी शीत ऋतु के पौष मास के शुक्ल पक्ष में। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। शास्त्रों का स्पष्ट कथन है कि इस पावन व्रत का विधिपूर्वक पालन करने से दंपत्तियों को गुणी, स्वस्थ, आज्ञाकारी और लंबी आयु वाली संतान की प्राप्ति होती है।
यह व्रत केवल संतान प्राप्ति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार में वर्षों से चली आ रही बाधाओं को दूर करने, कलह-क्लेश का नाश करने और घर के वातावरण में सकारात्मकता एवं दैवीय सुख-समृद्धि का संचार करने में भी सहायक है। भक्तगण इस शुभ दिन पर कठोर उपवास का संकल्प लेते हैं और जग के स्वामी श्रीहरि विष्णु तथा आदि शक्ति माता लक्ष्मी की पूजन सामग्री के साथ विधि-विधान से आराधना करते हैं। एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय तिथि माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन किया गया व्रत भक्त के समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों का शमन कर देता है और उसे मोक्ष तथा वैकुंठ धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यह व्रत दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों प्रकार के तापों से मुक्ति दिलाता है।
पौष पुत्रदा एकादशी 2025 की तिथियाँ और पारण का शुभ समय
हिन्दू पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2025 में पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 30 दिसंबर 2025 को प्रातः 07 बजकर 50 मिनट पर होगा। यह पुण्यकाल अगले दिन, यानी 31 दिसंबर 2025 को प्रातः 05 बजकर 00 मिनट पर समाप्त होगा। धर्मशास्त्रों में दिए गए नियमों के अनुरूप, गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले सामान्य जन 30 दिसंबर 2025, मंगलवार के दिन यह दिव्य व्रत रखेंगे। वहीं, उदय तिथि को महत्व देने वाली वैष्णव संप्रदाय की परंपराओं के अनुसार, उनके लिए यह एकादशी 31 दिसंबर 2025 को मान्य होगी।
व्रत का पालन करने के बाद, व्रत खोलने की क्रिया, जिसे पारण कहा जाता है, का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। पारण का शुभ मुहूर्त 31 दिसंबर 2025 को दोपहर 01 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर दोपहर 03 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। भक्तों को इसी मंगलकारी अवधि में अपने व्रत का समापन करना चाहिए। पारण के लिए भगवान विष्णु को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण), तुलसी दल, तिल और मौसमी फलों का भोग लगाकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करना सर्वाधिक शुभ माना गया है, जिससे व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है।
पौष पुत्रदा एकादशी की विस्तृत पूजन विधि
व्रत का अनुष्ठान करने वाले साधकों को एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदी या घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। स्नान के पश्चात, उन्हें शुद्ध और स्वच्छ वस्त्र धारण कर हाथ में जल लेकर व्रत का विधिवत संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद, एक स्वच्छ चौकी पर भगवान श्री विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करनी चाहिए।
उनकी पूजा में पीले चंदन, रोली, मोली (रक्षा सूत्र), अक्षत (चावल), विशेष रूप से पीले रंग के पुष्प, मौसमी फल और शुद्ध मिष्ठान का उपयोग करना अत्यधिक शुभ माना गया है। इन सभी वस्तुओं को भगवान को अर्पण करने के बाद, धूप और दीपक से उनकी प्रेमपूर्वक आरती करनी चाहिए और अंत में दीपदान अवश्य करना चाहिए। विशेष रूप से संतान की अभिलाषा रखने वाले दंपत्तियों को प्रातःकाल स्नान करके पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए और भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप की विशेष पूजा करनी चाहिए। इस पूजा के बाद, संतान गोपाल मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करना अतिशय फलदायी बताया गया है। पूरे दिन साधक को परनिंदा, छल, कपट, क्रोध और दूसरों के प्रति द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाओं से पूर्णतः दूर रहकर अपने मन और चित्त को पवित्र एवं शुद्ध अवस्था में बनाए रखना चाहिए।
इन शक्तिशाली मंत्रों का जाप करें और व्रत को पूर्ण करें
पौष पुत्रदा एकादशी के दिन शुभ फल प्राप्त करने के लिए भक्तों को विशेष मंत्रों का जाप करना चाहिए। भगवान श्रीहरि विष्णु के अत्यंत शक्तिशाली और मूल मंत्र - "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करने से मन को शांति, आध्यात्मिक शक्ति और दैवीय कृपा की अनुभूति होती है। इसके अतिरिक्त, भगवान विष्णु के एक हजार नामों का वर्णन करने वाले विष्णु सहस्रनाम का प्रेमपूर्वक पाठ करने से विशेष पुण्य और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यह पाठ समस्त प्रकार के संकटों का निवारण करने वाला माना गया है। एकादशी के अगले दिन, यानी द्वादशी तिथि को, व्रत का समापन होता है। इस दिन, ब्राह्मणों को आदरपूर्वक घर पर निमंत्रण देकर स्वादपूर्ण भोजन कराना और उन्हें दक्षिणा देना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद ही स्वयं भोजन करने से एकादशी व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की असीम अनुकंपा सदा बनी रहती है।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।