शत्रुसंहारक एकदन्त स्तोत्रम्

शत्रुसंहारक एकदन्त स्तोत्रम्

शत्रुसंहारक एकदन्त स्तोत्रम् भगवान श्रीगणेश के एकदन्त स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और उग्र प्रभाव वाला स्तोत्र है, जिसे विशेष रूप से शत्रु-विजय, बाधा-निवारण और संरक्षण के लिए पढ़ा जाता है। यह स्तोत्र साधक के चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा-कवच बनाता है और बाहरी–भीतरी शत्रुओं, नकारात्मक शक्तियों, ईर्ष्या-द्वेष और बाधाओं को नष्ट करने में प्रभावी माना जाता है। एकदन्त स्वरूप बुद्धि, वीर्य, दृढ़ता और शक्ति का प्रतीक है, इसलिए इस स्तोत्र के जप से साहस, आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता भी बढ़ती है।

नियमित श्रद्धा और एकाग्रता के साथ शत्रुसंहारक एकदन्त स्तोत्रम् का पाठ करने से साधक भयमुक्त होता है, मानसिक शांति पाता है और जीवन के कठिन परिस्थितियों का सामना दृढ़ता से कर पाता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से तब पढ़ा जाता है जब व्यक्ति शत्रु, अवरोध, कोर्ट-कचहरी, विवाद, नकारात्मक लोगों या छिपी शत्रुता से परेशान हो। बुधवार, चतुर्थी और प्रतिदिन सुबह या शाम इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।

 

 

देवर्षय ऊचुः ।
नमस्ते गजवक्त्राय गणेशाय नमो नमः ।
अनन्तानन्दभोक्त्रे वै ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे ॥ १ ॥

आदिमध्यान्तहीनाय चराचरमयाय ते ।
अनन्तोदरसंस्थाय नाभिशेषाय ते नमः ॥ २ ॥

कर्त्रे पात्रे च संहर्त्रे त्रिगुणानामधीश्वर ।
सर्वसत्ताधरायैव निर्गुणाय नमो नमः ॥ ३ ॥

सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं सिद्धिबुद्धिप्रदाय च ।
ब्रह्मभूताय देवेश सगुणाय नमो नमः ॥ ४ ॥

परशुं दधते तुभ्यं कमलेन प्रशोभिने ।
पाशाभयधरायैव महोदर नमो नमः ॥ ५ ॥

मूषकारूढदेवाय मूषकध्वजिने नमः ।
आदिपूज्याय सर्वाय सर्वपूज्याय ते नमः ॥ ६ ॥

गुणसम्युक्तकायाय निर्गुणात्मकमस्तक ।
तयोरभेदरूपेण चैकदन्ताय ते नमः ॥ ७ ॥

वेदान्तगोचरायैव वेदान्तालभ्यकाय ते ।
योगाधीशाय वै तुभ्यं ब्रह्माधीशाय ते नमः ॥ ८ ॥

अपारगुणधारायानन्तमायाप्रचालक ।
नानावतारभेदाय शान्तिदाय नमो नमः ॥ ९ ॥

वयं धन्या वयं धन्या यैर्दृष्टो गणनायकः ।
ब्रह्मभूयमयः साक्षात् प्रत्यक्षं पुरतः स्थितः ॥ १० ॥

एवं स्तुत्वा प्रहर्षेण ननृतुर्भक्तिसम्युताः ।
साश्रुनेत्रान् सरोमाञ्चान् दृष्ट्वा तान् ढुण्ढिरब्रवीत् ॥ ११ ॥

एकदन्त उवाच ।
वरं वृणुत देवेशा मुनयश्च यथेप्सितम् ।
दास्यामि तं न सन्देहो भवेद्यद्यपि दुर्लभः ॥ १२ ॥

भवत्कृतं मदीयं यत् स्तोत्रं सर्वार्थदं भवेत् ।
पठते श्रुण्वते देवा नानासिद्धिप्रदं द्विजाः ॥ १३ ॥

शत्रुनाशकरं चैवान्ते स्वानन्दप्रदायकम् ।
पुत्रपौत्रादिकं सर्वं लभते पाठतो नरः ॥ १४ ॥

इति श्रीमन्मुद्गलपुराणे द्वितीयेखण्डे एकदन्तचरिते द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याये एकदन्तस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

यदि आप जीवन में शत्रुओं से परेशान हैं, तो आपको इस स्तोत्र का रोजाना पाठ करना चाहिए।


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

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