
1268
चालीसा
सार: विष्णु चालीसा का पाठ करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। यह चालीसा शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करती है। श्रद्धा और भक्ति से पाठ करने वाला साधक जीवन की कठिनाइयों से मुक्त होकर दिव्य ऊर्जा का अनुभव करता है।
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चित लाय।
कीरत कुछ वर्णन करूं, दीजे ज्ञान बताय॥
नमो विष्णु भगवान खरसारी, कष्ट नाशवन अखिल बिहारी।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुंदर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहिनी मूरत।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, वैजयन्ती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
संत भक्त सज्जन मन रंजन, दानव असुर दुष्ट दल गंजन।
सुख उपजै कष्ट सब भंजन, दोष मिटै करत जन सज्जन॥
पाप काट भवसिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण॥
धरनी धेनु बन तुम्हीं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदि को संहारा॥
आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया।
धर मत्स्य तन सिंधु बनाया, चौदह रत्नन को निकालाया॥
अमिलख असुरन द्वंद मचाया, रूप मोहिनी आप दिखाया।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिंधु मजहाया, मन्दराचल गिरि तुरत उठाया।
शंकर का तुम फंद छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुंढवाया।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसे कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई, शंकर से उन कीन लडाई।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी।
तब तुम बने मुनिश्वर ग्यानी, वृंदा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी, वृंदा आय तुम्हें लपटानी।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हन असुर उर शिव शैतानी॥
तुमने ध्रुव प्रह्लाद उबारे, हिरण्यकुश आदि खल मारे।
गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भवसिन्धु उबारे॥
हरहु सकल सन्ताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे।
देखूं मैं निज दर्श तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
चहत आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन।
जानूं नहीं योग्य जप पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
शील दया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रत बोध विलक्षण।
करहु आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
करहु प्रणाम कौन विधि सुमिरन, कौन भांति मैं करहु समर्पन।
सुर मुनि करहिं सदा सेवकाई, हरषित रहत परम गति पाई॥
दीन दुखी पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई।
पाप दोष सन्ताप नशाओ, भव बंधन से मुक्त कराओ॥
सुत संपत्ति दे सुख उपजाओ, निज चरणन का दास बनाओ।
निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़े सुनै सो जन सुख पावै॥
