ज्योतिष में राहु का क्या महत्व है? जानिए कुछ खास विशेष बातें-

ज्योतिष में राहु का क्या महत्व है? जानिए कुछ खास विशेष बातें-

ज्योतिष में राहु का क्या महत्व है? जानिए कुछ खास विशेष बातें

ज्योतिष में राहु की एकमात्र ऐसा ग्रह है, जिसके कारण व्यक्ति सबसे अधिक परेशान रहता है। राहु को कठोर वाणी, जुआं, यात्रा, वायुयान की यात्रा, त्वचा रोग और टेक्नोलॉजी का कारक कहा गया है। यदि कुंडली में राहु किसी अशुभ स्थान पर हो, तो व्यक्ति के लिए यह सबसे अधिक नकारात्मक परिणाम देने वाला माना जाता है। राहु मिथुन राशि में उच्च का और धनु राशि में नीच का होता है। नक्षत्रों में आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा राहु के नक्षत्र माने जाते हैं। रोजाना दिन में करीब 1.30 घंटे के लिए राहुकाल होता है। यह समय अशुभ कहलाता है और इस समय यात्रा करना या किसी भी तरह का शुभ काम करना अच्छा नहीं माना जाता है। राहु एक छाया ग्रह है। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा आ जाता है, तो चंद्रमा की पृथ्वी पर पड़ने वाली छाया राहु कहलाती है।


कुंडली में राहु का प्रभाव 


कुंडली में राहु यदि लग्न यानी पहले भाव में हो, तो जातक चालाक, सुंदर और साहसी होता है। लग्न का राहु व्यक्ति को समाज में काफी प्रभावशाली बनाता है। हालांकि ऐसा व्यक्ति जिद्दी किस्म का होता है। वैवाहिक जीवन के लिए लग्न और सातवें भाव का राहु कभी अच्छा नहीं माना जाता है। यदि राहु आपकी कुंडली में बली हो या छठे, ग्यारहवें स्थान में हो अच्छी राशि में हो, तो व्यक्ति को प्रखर बुद्धिमान बनाता है। व्यक्ति धर्मपालन करता है और समाज में मान-सम्मान और यश की प्राप्ति होती है।
यदि राहु नकारात्मक है, तो काफी परेशान कर सकता है। ऐसे व्यक्ति के अंदर बुरी आदत विकसित हो जाती है। पीड़ित राहु के प्रभाव से छल, कपट और धोखा देने वाला बन जाता है। व्यक्ति को नशे की आदत लग सकती है। पीड़ित व्यक्ति गलत आदतों को जल्दी अपना लेता है। 


राहु की महादशा और गोचर


आमतौर पर राहु की महादशा का समय काफी बेकार होता है। ज्यादातर व्यक्ति इस समय मानसिक परेशानियों से गुजरते हैं। नींद नहीं आना, पागलपन, बात-बात पर चिड़ना आदि कई तरह की समस्याएं होने लगती है। आमतौर पर राहु की महादशा में कॅरियर या बिजनेस में नुकसान, काम नहीं बनना आदि समस्याएं होती है। गोचर में भी राहु 11वें, दसवें, छठे और तीसरे भाव से गुजरता है, तो काफी अच्छा रहता है।

राहु के जन्म की कहानी


राहु के जन्म की कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब समुद्र से अमृत कलश निकला, तब असुरों ने उसे झपट लिया। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। मोहिनी की बात में आकर देवता और असुर अलग-अलग पंक्ति में बैठ गए, तब स्वरभानु असुर ने देवताओं का रूप लेकर अमृत पी लिया। तब विष्णुजी ने सुदर्शन से उसका धड़ दो भागों में बांट दिया। यही दो भाग राहु और केतु कहलाते हैं। 

 

जानते हैं राहु को एक नजर में


उच्च राशि - मिथुन (कुछ जगह पर वृषभ)
कार्य- जासूसी, राजनीतिक काम, सेवा, जादूगर, ज्योतिष आदि
रत्न- गोमेद
रुद्राक्ष- 8 मुखी रुद्राक्ष
रंग - गहरा नीला या गहरा ब्राउन

मंत्र
राहु का तांत्रिक मंत्र
ॐ रां राहवे नमः

राहु का बीज मंत्र
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

कैटेगरी

आपके लिए रिपोर्ट्स

    अनुशंसित पूजा

      Ask Question

      आपके लिए खरीदारी

      आपके लिए रिपोर्ट्स

      त्रिलोक ऐप में आपका स्वागत है!

      image