
जन्मकुंडली का छठा भाव - कौन सा ग्रह देगा आपको क्या रोग ?

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पूजा
व्यक्ति की आंतरिक शक्ति ही वह ताकत है, जिससे वह बाहरी तनावपूर्ण स्थितियों का सामना कर सकता है। ज्योतिष शास्त्र में जन्मकुंडली का छठा भाव जातक की इसी आंतरिक शक्ति, शत्रुओं को परास्त करने की क्षमता और स्वास्थ्य की स्थिति को दर्शाता है।
जन्मकुंडली का छठा भाव: स्वास्थ्य और आंतरिक शक्ति का विश्लेषण
छठे भाव से संबंधित ग्रह यह दर्शाते हैं कि जातक शारीरिक और मानसिक रूप से कितना सक्षम होगा। आइए जानते हैं कि इस भाव में अलग-अलग ग्रहों की स्थिति जातक के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव डालती है:
1. छठे भाव में सूर्य (Sun in 6th House)
यदि व्यक्ति की कुंडली के छठे भाव में सूर्य स्थित हो, तो जातक अक्सर रोगग्रस्त रह सकता है। राशि के अनुसार इसके प्रभाव भिन्न होते हैं:
- हृदय और दमा: यदि सूर्य वृष, वृश्चिक या कुंभ राशि में हो, तो हृदय कष्ट या दमा की शिकायत हो सकती है।
- क्षय रोग: मिथुन, कन्या या मीन राशि में होने पर क्षय रोग (TB) का खतरा रहता है।
- उदर विकार: कर्क, तुला या मकर राशि में होने पर पेट से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं।
- शुभ प्रभाव: यदि सूर्य शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक निरोगी और शक्तिशाली होता है।
2. छठे भाव में चन्द्रमा (Moon in 6th House)
शुभ चंद्रमा व्यक्ति को निरोगी बनाता है, लेकिन इसकी स्थिति बिगड़ने पर निम्नलिखित प्रभाव होते हैं:
- कंठ रोग: वृष राशि का चंद्रमा गले से संबंधित परेशानी दे सकता है।
- कफ विकार: मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि का चंद्रमा कफ से जुड़ी बीमारियां देता है।
- गंभीर रोग: यदि चंद्रमा वृश्चिक राशि में हो, तो बवासीर जैसी समस्या हो सकती है। यदि मंगल की स्थिति प्रतिकूल हो, तो त्वचा संबंधी गंभीर रोगों का भय रहता है।
3. छठे भाव में बुध और गुरु (Mercury & Jupiter)
- बुध (Mercury): छठे भाव में बुध होने पर जातक हाथ-पांव का रोगी, श्वास रोगी या मानसिक व्याधि से युक्त हो सकता है।
- गुरु (Jupiter): यहाँ स्थित गुरु जातक को शारीरिक रूप से थोड़ा बलहीन बनाता है। यदि गुरु पाप ग्रहों के प्रभाव में हो, तो शीत रोग या भयंकर पीड़ा की संभावना रहती है।
4. छठे भाव में शुक्र और शनि (Venus & Saturn)
- शुक्र (Venus): यदि शुक्र यहाँ नीच राशि में, अस्त या शत्रु राशि में हो, तो रोगों में वृद्धि होती है।
- शनि (Saturn): सिंह या वृश्चिक राशि का शनि हृदय और मूत्राशय संबंधी रोग दे सकता है। वहीं मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि का शनि क्षय रोग का कारण बन सकता है।
5. राहु और केतु का प्रभाव (Rahu & Ketu)
छठे भाव में राहु और केतु की स्थिति बहुत ही रहस्यमयी होती है:
- शुभ स्थिति: उच्च राशि के राहु-केतु जातक को निरोगी और शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला बनाते हैं।
- अशुभ स्थिति: यदि ये अशुभ अवस्था में हों, तो जातक को रहस्यमयी या मनोवैज्ञानिक रोगों (जैसे भूत-प्रेत जन्य भ्रम) का सामना करना पड़ सकता है।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।