
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग - महत्व, कथा, इतिहास और मंत्र

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सोमनाथ ज्योतिर्लिंग - महत्व, कथा, इतिहास और मंत्र
ज्योतिर्लिंग हमारी आस्था का केंद्र है। ज्योतिर्लिंग ऊर्जा का सबसे बड़ा सोर्स है। देश में 12
ज्योतिर्लिंग है, जो सुदूर हिमालय से लेकर रामेश्वरम् तक है। इन सब में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग जिस क्षेत्र में है, उसे प्रभासपाटन कहा जाता है। जानते हैं सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का महत्व, कथा और पूजा विधि के बारे में
सोमनाथ मंदिर की प्रमुख पौराणिक कथा
पुराणों में दी गई कथा के अनुसार चंद्रमा (सोम) दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों के पति थे। इन सब में चंद्रमा को अपनी पत्नी रोहिणी से ही विशेष स्नेह था, जिससे अन्य 26 पत्नियां खुद को बेहद अपमानित महसूस किया। इस बात से नाराज पत्नियों ने चंद्र देव की शिकायत अपने पिता से की। जब यह बात दक्ष प्रजापति को पता चली, तो वे बेहद दु:खी हुए। उन्होंने चंद्रदेव को समझाने का प्रयास भी किया, लेकिन असफल रहे। तब राजा दक्ष ने चंद्रमा शाप श्राप दिया कि उनका तेज धीरे-धीरे कमजोर हो जाएगा और वे क्षीण होकर नष्ट हो जाएंगे।
दक्ष प्रजापति के शाप के कारण चंद्रमा का तेज कम होने लगा और वे अत्यंत दु:खी हो गए और अपनी करनी पर पछताने लगे। इस शाप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रमा ने ब्रह्माजी के कहने पर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रभास तट पर जाकर, शिवलिंग की स्थापना कर उनकी पूजा की और भगवान शिव की घोर तपस्या करने लग गए।
चंद्रमा की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और क्षीण होने के बाद फिर से तेज प्राप्ति का वरदान दिया, लेकिन भगवान शिव ने चंद्रमा को पूरी तरह से शाप मुक्त नहीं किया। भगवान शिव ने चंद्रमा को आशीर्वाद दिया और कहा कि वे प्रत्येक 15 दिनों में प्रत्येक पूर्णिमा पर फिर से पूरे तेज में आ जाएंगे। फिर से क्षीण होने लगेंगे। इसके बाद भगवान शिव के कहने पर चंद्रमा सभी पत्नियों के घर बारी-बारी से जाने लगे।
इसके बाद चंद्रमा की प्रार्थना पर शिव प्रभास क्षेत्र में स्थायी रूप से ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करने लगे और इस तरह भगवान शिव प्रभास क्षेत्र में ज्योतिर्लिंग के रूप में बस गए।
सोमनाथ मंदिर का इतिहास
पुराणों के अनुसार पश्चिम समुद्र के तट पर सोमनाथ मंदिर सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। कुछ कथाओं के अनुसार गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया। इस मंदिर को लाल पत्थरों से बनाया गया था। जिसकी वजह से इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा, जिससे प्रभावित हो महमूद गजनवी ने सन 1024 में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया।
इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया, तो इसे पाँचवीं बार इसे गिराया दिया गया। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। अहिल्याबाई ने भी इसका पुनर्निमाण कराया था। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया। मंदिर का बार बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा।
श्रीकृष्ण ने भी जीवन यहीं त्यागा
कहते हैं श्रीकृष्ण भी भगवान सोमनाथ के भक्त थे। महाभारत के युद्ध के बाद जब श्रीकृष्ण द्वारका लौटे, तब वे अपने भाई बलराम के साथ सोमनाथ की यात्रा पर गए। यहां त्रिवेणी घाट पर श्रीकृष्ण ने बलराम को पृथ्वी लोक से जाने की बात कही। तब यहीं से बलराम ने शेषनाग का अवतार लेकर नदी के रास्ते पाताल लोक चले गए। श्रीकृष्ण भी सोमनाथ क्षेत्र में ही एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे, तब जरा नामक व्याध (शिकारी) का तीर गलती से भगवान श्रीकृष्ण के पैरों में लग गया और वे उन्होंने महाप्रस्थान किया।
सोमनाथ पूजा से चंद्रमा को करें शांत
कुंडली में चंद्रमा से संबंधित किसी भी दोष की शांति के लिए सोमनाथ भगवान की पूजा करने का विधान है। जब कुंडली में चंद्रमा खराब होता है, तो व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। ऋग्वेद में चंद्रमा को मनसो जातक कहा गया है। यानी चंद्रमा मन का प्रतिनिधित्व करता है। यदि मन से कोई व्यक्ति दु:खी है, तो फिर वह दु:खी ही रहता है। यदि कुंडली में चंद्रमा का केमद्रुम दोष बनता है, सोमनाथ भगवान के विशेष मंत्रों का जाप करना चाहिए।
भगवान सोमनाथ के मंत्र
- ॐ हौं जूं सः ।।
- ॐ सोमनाथाय नम: ।।
- ॐ सांबसदाशिवाय नम:।।
- ॐ नमो नीलकण्ठाय नम:।।
- ॐ नम: शिवाय
इन मंत्रों के साथ महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाना चाहिए।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
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