श्री अम्बाभुजङ्गपञ्चरत्न स्तोत्रम्

श्री अम्बाभुजङ्गपञ्चरत्न स्तोत्रम्

वधूरोजगोत्रोधराग्रे चरन्तं
लुठन्तं प्लवन्तं नटं तपतन्तम्
पदं ते भजन्तं मनोमर्कटन्तं
कटाक्षालिपाशैस्सुबद्धं कुरु त्वम् ॥ १ ॥

गजास्यष्षडास्यो यथा ते तथाहं
कुतो मां न पश्यस्यहो किं ब्रवीमि
सदा नेत्रयुग्मस्य ते कार्यमस्ति
तृतीयेन नेत्रेण वा पश्य मां त्वम् ॥ २ ॥

त्वयीत्थं कृतं चेत्तव स्वान्तमम्ब
प्रशीतं प्रशीतं प्रशीतं किमासीत्
इतोऽन्यत्किमास्ते यशस्ते कुतस्स्यात्
ममेदं मतं चापि सत्यं ब्रवीमि ॥ ३ ॥

इयद्दीनमुक्त्वापि तेऽन्नर्त शीतं
ततश्शीतलाद्रेः मृषा जन्मते भूत्
कियन्तं समालम्बकालं वृथास्मि
प्रपश्यामि तेऽच्छस्वरूपं कदाहम् ॥ ४ ॥

जगत्सर्वसर्गस्थितिध्वंसहेतु
स्त्वमेवासि सत्यं त्वमेवासि नित्यं
त्वदन्येषु देवेष्वनित्यत्वमुक्तं
त्वदङ्घ्रिद्वयासक्तचित्तोहमम्ब ॥ ५ ॥

इति श्रीमत्कामाचार्यरचितमम्बाभुजङ्गस्तोत्र पञ्चरत्नम् ॥


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