बालरक्षा स्तोत्रम् (गोपी कृतम्)

बालरक्षा स्तोत्रम् (गोपी कृतम्)

अव्यादजोऽङ्घ्रि मणिमांस्तव जान्वथोरू
यज्ञोऽच्युतः कटितटं जठरं हयास्यः ।
हृत् केशवस्त्वदुर ईश इनस्तु कण्ठं
विष्णुर्भुजं मुखमुरुक्रम ईश्वरः कम् ॥ १ ॥

चक्र्यग्रतः सहगदो हरिरस्तु पश्चात्
त्वत्पार्श्वयोर्धनुरसी मधुहाजनश्च ।
कोणेषु शङ्खः उरुगाय उपर्युपेन्द्रः
तार्क्ष्यः क्षितौ हलधरः पुरुषः समन्तात् ॥ २ ॥

इन्द्रियाणि हृषीकेशः प्राणान् नारायणोऽवतु ।
श्वेतद्वीपपतिश्चित्तं मनो योगीश्वरोऽवतु ॥ ३ ॥

पृश्निगर्भश्च ते बुद्धिमात्मानं भगवान् हरिः ।
क्रीडन्तं पातु गोविन्दः शयानं पातु माधवः ॥ ४ ॥

व्रजन्तमव्याद्वैकुण्ठ आसीनं त्वां श्रियः पतिः ।
भुञ्जानं यज्ञभुक् पातु सर्वग्रहभयङ्करः ॥ ५ ॥

डाकिन्यो यातुधान्यश्च कुष्माण्डा येऽर्भकग्रहाः ।
भूतप्रेतपिशाचाश्च यक्षरक्षोविनायकाः ॥ ६ ॥

कोटरा रेवती ज्येष्ठा पूतना मातृकादयः ।
उन्मादा ये ह्यपस्मारा देहप्राणेन्द्रियद्रुहः ॥ ७ ॥

स्वप्नदृष्टा महोत्पाता वृद्धबालग्रहाश्च ये ।
सर्वे नश्यन्तु ते विष्णोर्नामग्रहणभीरवः ॥ ८ ॥

इति श्रीमद्भागवते दशमस्कन्धे षष्ठोऽध्याये बालरक्षा स्तोत्रम् ।


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