श्री बालकृष्णाष्टकम् २

श्री बालकृष्णाष्टकम् २

श्रीमन्नन्दयशोदाहृदयस्थितभावतत्परो भगवान् ।
पुत्रीकृतनिजरूपः स जयति पुरतः कृपालुर्बालकृष्णः ॥ १ ॥

कथमपि रिङ्गणमकरोदङ्गणगतजानुघर्षणोद्युक्तः ।
कटितटकिङ्किणिजालस्वनशङ्कितमानसः सदा ह्यास्ते ॥ २ ॥

विकसितपङ्कजनयनः प्रकटितहर्षः सदैव धूसराङ्गः ।
परिगच्छति कटिभङ्गप्रसरीकृतपाणियुग्माभ्याम् ॥ ३ ॥

उपलक्षितदधिभाण्डः स्फुरितब्रह्माण्डविग्रहो भुङ्क्ते ।
मुष्टीकृतनवनीतः परमपुनीतो मुग्धभावात्मा ॥ ४ ॥

नम्रीकृतविधुवदनः प्रकटीकृतचौर्यगोपनायासः ।
स्वाम्बोत्सङ्गविलासः क्षुधितः सम्प्रति दृश्यते स्तनार्थी ॥ ५ ॥

सिंहनखाकृतिभूषणभूषितहृदयः सुशोभते नित्यम् ।
कुण्डलमण्डितगण्डः साञ्जननयनो निरञ्जनः शेते ॥ ६ ॥

कार्यासक्तयशोदागृहकर्मावरोधकः सदास्ते ।
तस्याः स्वान्तनिविष्टप्रणयप्रभाजनो यतोऽयम् ॥ ७ ॥

इत्थं व्रजपतितरुणी नमनीयं ब्रह्मरुद्राद्यैः ।
कमनीयं निजसूनुं लालयति स्म प्रत्यहं प्रीत्या ॥ ८ ॥

श्रीमद्वल्लभकृपया विशदीकृतमेतदष्टकं पठेद्यः ।
तस्य दयानिधिकृष्णो भक्तिः प्रेमैकलक्षणा शीघ्रम् ॥ ९ ॥

इति श्रीकृष्णदास कृतं श्री बालकृष्णाष्टकम् ।


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