श्री भद्रकाली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्री भद्रकाली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्री भद्रकाली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का पाठ स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर घर के मंदिर में मां भद्रकाली की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर श्रद्धा से करना चाहिए, और इसे मंगलवार, शुक्रवार, अमावस्या या प्रतिदिन सुबह-शाम पढ़ना शुभ माना जाता है; इसके नियमित जप से नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं, भय और बाधाएँ समाप्त होती हैं, मानसिक शांति, साहस, समृद्धि और सुरक्षा मिलती है तथा साधक के जीवन में देवी का दिव्य संरक्षण और शीघ्र कृपा प्राप्त होती है।

 

 

श्रीनन्दिकेश्वर उवाच ।
भद्रकालीमहं वन्दे वीरभद्रसतीं शिवाम् ।
सुताम्रार्चितपादाब्जं सुखसौभाग्यदायिनीम् ॥ १ ॥

अथ स्तोत्रम् ।
भद्रकाली कामरूपा महाविद्या यशस्विनी ।
महाश्रया महाभागा दक्षयागविभेदिनी ॥ २ ॥

रुद्रकोपसमुद्भूता भद्रा मुद्रा शिवङ्करी ।
चन्द्रिका चन्द्रवदना रोषताम्राक्षशोभिनी ॥ ३ ॥

इन्द्रादिदमनी शान्ता चन्द्रलेखाविभूषिता ।
भक्तार्तिहारिणी मुक्ता चण्डिकानन्ददायिनी ॥ ४ ॥

सौदामिनी सुधामूर्तिः दिव्यालङ्कारभूषिता ।
सुवासिनी सुनासा च त्रिकालज्ञा धुरन्धरा ॥ ५ ॥

सर्वज्ञा सर्वलोकेशी देवयोनिरयोनिजा ।
निर्गुणा निरहङ्कारा लोककल्याणकारिणी ॥ ६ ॥

सर्वलोकप्रिया गौरी सर्वगर्वविमर्दिनी ।
तेजोवती महामाता कोटिसूर्यसमप्रभा ॥ ७ ॥

वीरभद्रकृतानन्दभोगिनी वीरसेविता ।
नारदादिमुनिस्तुत्या नित्या सत्या तपस्विनी ॥ ८ ॥

ज्ञानरूपा कलातीता भक्ताभीष्टफलप्रदा ।
कैलासनिलया शुभ्रा क्षमा श्रीः सर्वमङ्गला ॥ ९ ॥

सिद्धविद्या महाशक्तिः कामिनी पद्मलोचना ।
देवप्रिया दैत्यहन्त्री दक्षगर्वापहारिणी ॥ १० ॥

शिवशासनकर्त्री च शैवानन्दविधायिनी ।
भवपाशनिहन्त्री च सवनाङ्गसुकारिणी ॥ ११ ॥

लम्बोदरी महाकाली भीषणास्या सुरेश्वरी ।
महानिद्रा योगनिद्रा प्रज्ञा वार्ता क्रियावती ॥ १२ ॥

पुत्रपौत्रप्रदा साध्वी सेनायुद्धसुकाङ्क्षिणी ।
इच्छा शम्भोः कृपासिन्धुः चण्डी चण्डपराक्रमा ॥ १३ ॥

शोभा भगवती माया दुर्गा नीला मनोगतिः ।
खेचरी खड्गिनी चक्रहस्ता शूलविधारिणी ॥ १४ ॥

सुबाणा शक्तिहस्ता च पादसञ्चारिणी परा ।
तपःसिद्धिप्रदा देवी वीरभद्रसहायिनी ॥ १५ ॥

धनधान्यकरी विश्वा मनोमालिन्यहारिणी ।
सुनक्षत्रोद्भवकरी वंशवृद्धिप्रदायिनी ॥ १६ ॥

ब्रह्मादिसुरसंसेव्या शाङ्करी प्रियभाषिणी ।
भूतप्रेतपिशाचादिहारिणी सुमनस्विनी ॥ १७ ॥

पुण्यक्षेत्रकृतावासा प्रत्यक्षपरमेश्वरी ।
एवं नाम्नां भद्रकाल्याः शतमष्टोत्तरं विदुः ॥ १८ ॥

पुण्यं यशो दीर्घमायुः पुत्रपौत्रं धनं बहु ।
ददाति देवी तस्याशु यः पठेत् स्तोत्रमुत्तमम् ॥ १९ ॥

भौमवारे भृगौ चैव पौर्णमास्यां विशेषतः ।
प्रातः स्नात्वा नित्यकर्म विधाय च सुभक्तिमान् ॥ २० ॥

वीरभद्रालये भद्रां सम्पूज्य सुरसेविताम् ।
पठेत् स्तोत्रमिदं दिव्यं नाना भोगप्रदं शुभम् ॥ २१ ॥

अभीष्टसिद्धिं प्राप्नोति शीघ्रं विद्वान् परन्तप ।
अथवा स्वगृहे वीरभद्रपत्नीं समर्चयेत् ॥ २२ ॥

स्तोत्रेणानेन विधिवत् सर्वान् कामानवाप्नुयात् ।
रोगा नश्यन्ति तस्याशु योगसिद्धिं च विन्दति ॥ २३ ॥

सनत्कुमारभक्तानामिदं स्तोत्रं प्रबोधय ।
रहस्यं सारभूतं च सर्वज्ञः सम्भविष्यसि ॥ २४ ॥

इति श्रीभद्रकाल्यष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ।


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

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