श्री बुद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्री बुद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

सूर्य उवाच ।
मूलवह्निसमुद्भूता मूलाज्ञानविनाशिनी ।
निरुपाधिमहामाया शारदा प्रणवात्मिका ॥ १ ॥

सुषुम्नामुखमध्यस्था चिन्मयी नादरूपिणी ।
नादातीता ब्रह्मविद्या मूलविद्या परात्परा ॥ २ ॥

सकामदायिनीपीठमध्यस्था बोधरूपिणी ।
मूलाधारस्थगणपदक्षिणाङ्कनिवासिनी ॥ ३ ॥

विश्वाधारा ब्रह्मरूपा निराधारा निरामया ।
सर्वाधारा साक्षिभूता ब्रह्ममूला सदाश्रया ॥ ४ ॥

विवेकलभ्य वेदान्तगोचरा मननातिगा ।
स्वानन्दयोगसंलभ्या निदिध्यासस्वरूपिणी ॥ ५ ॥

विवेकादिभृत्ययुता शमादिकिङ्करान्विता ।
भक्त्यादिकिङ्करीजुष्टा स्वानन्देशसमन्विता ॥ ६ ॥

महावाक्यार्थसंलभ्या गणेशप्राणवल्लभा ।
तमस्तिरोधानकरी स्वानन्देशप्रदर्शिनी ॥ ७ ॥

स्वाधिष्ठानगता वाणी रजोगुणविनाशिनी ।
रागादिदोषशमनी कर्मज्ञानप्रदायिनी ॥ ८ ॥

मणिपूराब्जनिलया तमोगुणविनाशिनी ।
अनाहतैकनिलया गुणसत्त्वप्रकाशिनी ॥ ९ ॥

अष्टाङ्गयोगफलदा तपोमार्गप्रकाशिनी ।
विशुद्धिस्थाननिलया हृदयग्रन्धिभेदिनी ॥ १० ॥

विवेकजननी प्रज्ञा ध्यानयोगप्रबोधिनी ।
आज्ञाचक्रसमासीना निर्गुणब्रह्मसम्युता ॥ ११ ॥

ब्रह्मरन्ध्रपद्मगता जगद्भावप्रणाशिनी ।
द्वादशान्तैकनिलया स्वस्वानन्दप्रदायिनी ॥ १२ ॥

पीयूषवर्षिणी बुद्धिः स्वानन्देशप्रकाशिनी ।
इक्षुसागरमध्यस्था निजलोकनिवासिनी ॥ १३ ॥

वैनायकी विघ्नहन्त्री स्वानन्दब्रह्मरूपिणी ।
सुधामूर्तिः सुधावर्णा केवला हृद्गुहामयी ॥ १४ ॥

शुभ्रवस्त्रा पीनकुचा कल्याणी हेमकञ्चुका ।
विकचाम्भोरुहदललोचना ज्ञानरूपिणी ॥ १५ ॥

रत्नताटङ्कयुगला भद्रा चम्पकनासिका ।
रत्नदर्पणसङ्काशकपोला निर्गुणात्मिका ॥ १६ ॥

ताम्बूलपूरितस्मेरवदना सत्यरूपिणी ।
कम्बुकण्ठी सुबिम्बोष्ठी वीणापुस्तकधारिणी ॥ १७ ॥

गणेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता ।
कैवल्यज्ञानसुखदपदाब्जा भारती मतिः ॥ १८ ॥

वज्रमाणिक्यकटककिरीटा मञ्जुभाषिणी ।
विघ्नेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा ॥ १९ ॥

अनेककोटिकेशार्कयुग्मसेवितपादुका ।
वागीश्वरी लोकमाता महाबुद्धिः सरस्वती ॥ २० ॥

चतुष्षष्टिकोटिविद्याकलालक्ष्मीनिषेविता ।
कटाक्षकिङ्करीभूतकेशबृन्दसमन्विता ॥ २१ ॥

ब्रह्मविष्ण्वीशशक्तीनां दृशा शासनकारिणी ।
पञ्चचित्तवृत्तिमयी तारमन्त्रस्वरूपिणी ॥ २२ ॥

वरदा भक्तिवशगा भक्ताभीष्टप्रदायिनी ।
ब्रह्मशक्तिर्महामाया जगद्ब्रह्मस्वरूपिणी ॥ २३ ॥

अष्टोत्तरशतं नाम्नां महाबुद्धेर्वरन्तगम् ।
यः पठेद्भक्तिभावेन विद्यां बुद्धिं श्रियं बलम् ।
सम्प्राप्य ज्ञानमतुलं ब्रह्मभूयमवाप्नुयात् ॥ २४ ॥

इति श्री बुद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

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