श्री गोपाल स्तोत्रम् (नारद कृतम्)

श्री गोपाल स्तोत्रम् (नारद कृतम्)

श्रीनारद उवाच ।
नवीननीरदश्यामं नीलेन्दीवरलोचनम् ।
वल्लवीनन्दनं वन्दे कृष्णं गोपालरूपिणम् ॥ १ ॥

स्फुरद्बर्हिदलोद्बद्धनीलकुञ्चितमूर्धजम् ।
कदम्बकुसुमोद्बद्धवनमालाविभूषितम् ॥ २ ॥

गण्डमण्डलसंसर्गिचलत्काञ्चनकुण्डलम् ।
स्थूलमुक्ताफलोदारहारोद्योतितवक्षसम् ॥ ३ ॥

हेमाङ्गदतुलाकोटिकिरीटोज्ज्वलविग्रहम् ।
मन्दमारुतसङ्क्षोभवल्गिताम्बरसञ्चयम् ॥ ४ ॥

रुचिरौष्ठपुटन्यस्तवंशीमधुरनिःस्वनैः ।
लसद्गोपालिकाचेतो मोहयन्तं मुहुर्मुहुः ॥ ५ ॥

वल्लवीवदनाम्भोजमधुपानमधुव्रतम् ।
क्षोभयन्तं मनस्तासां सस्मरापाङ्गवीक्षणैः ॥ ६ ॥

यौवनोद्भिन्नदेहाभिः संसक्ताभिः परस्परम् ।
विचित्राम्बरभूषाभिर्गोपनारीभिरावृतम् ॥ ७ ॥

प्रभिन्नाञ्जनकालिन्दीदलकेलिकलोत्सुकम् ।
योधयन्तं क्वचिद्गोपान् व्याहरन्तं गवां गणम् ॥ ८ ॥

कालिन्दीजलसंसर्गिशीतलानिलसेविते ।
कदम्बपादपच्छाये स्थितं वृन्दावने क्वचित् ॥ ९ ॥

रत्नभूधरसंलग्नरत्नासनपरिग्रहम् ।
कल्पपादपमध्यस्थहेममण्डपिकागतम् ॥ १० ॥

वसन्तकुसुमामोदसुरभीकृतदिङ्मुखे ।
गोवर्धनगिरौ रम्ये स्थितं रासरसोत्सुकम् ॥ ११ ॥

सव्यहस्ततलन्यस्तगिरिवर्यातपत्रकम् ।
खण्डिताखण्डलोन्मुक्तामुक्तासारघनाघनम् ॥ १२ ॥

वेणुवाद्यमहोल्लासकृतहुङ्कारनिःस्वनैः ।
सवत्सैरुन्मुखैः शश्वद्गोकुलैरभिवीक्षितम् ॥ १३ ॥

कृष्णमेवानुगायद्भिस्तच्चेष्टावशवर्तिभिः ।
दण्डपाशोद्धृतकरैर्गोपालैरुपशोभितम् ॥ १४ ॥

नारदाद्यैर्मुनिश्रेष्ठैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ।
प्रीतिसुस्निग्धया वाचा स्तूयमानं परात्परम् ॥ १५ ॥

य एवं चिन्तयेद्देवं भक्त्या संस्तौति मानवः ।
त्रिसन्ध्यं तस्य तुष्टोऽसौ ददाति वरमीप्सितम् ॥ १६ ॥

राजवल्लभतामेति भवेत्सर्वजनप्रियः ।
अचलां श्रियमाप्नोति स वाग्मी जायते ध्रुवम् ॥ १७ ॥

इति श्रीनारदपञ्चरात्रे ज्ञानामृतसारे श्री गोपाल स्तोत्रम् ॥


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