आप श्री हालास्येशाष्टकम् का पाठ प्रातः या सायंकाल शांत मन से, विशेषकर सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि या किसी भी शुभ तिथि पर कर सकते हैं। इसे शिवलिंग के सामने दीप जलाकर, जल या दूध अर्पित करके और भगवान हालास्येश्वर—जो मदुरै के प्रसिद्ध शिवस्वरूप माने जाते हैं—का स्मरण करते हुए पढ़ना श्रेष्ठ माना जाता है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक को शिवकृपा सहज रूप से प्राप्त होती है। जीवन की बाधाएँ, भय, अस्थिरता और मानसिक अशांति दूर होती है। यह स्तोत्र स्वास्थ्य, दीर्घायु और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। परिवार में सौहार्द बढ़ता है और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। शिव से संबंधित ग्रहदोष—विशेषकर चंद्र, राहु और शनि के प्रभाव—शांत होते हैं, और साधक के जीवन में शांति, सुरक्षा, समृद्धि और दिव्य शक्ति का अनुभव बढ़ता है।
कुण्डोदर उवाच ।
शैलाधीशसुतासहाय सकलाम्नायान्तवेद्य प्रभो
शूलोग्राग्रविदारितान्धकसुरारातीन्द्रवक्षस्थल ।
कालातीत कलाविलास कुशल त्रायेत ते सन्ततं
हालास्येश कृपाकटाक्षलहरी मामापदामास्पदम् ॥ १ ॥
कोलाच्छच्छदरूपमाधव सुरज्यैष्ठ्यातिदूराङ्घ्रिक
नीलार्धाङ्ग निवेशनिर्जरधुनीभास्वज्जटामण्डल ।
कैलासाचलवास कार्मुकहर त्रायेत ते सन्ततं
हालास्येश कृपाकटाक्षलहरी मामापदामास्पदम् ॥ २ ॥
फालाक्षप्रभवप्रभञ्जनसख प्रोद्यत्स्फुलिङ्गच्छटा-
-तूलानङ्गकचारुसंहनन सन्मीनेक्षणावल्लभ ।
शैलादिप्रमुखैर्गणैः स्तुतगण त्रायेत ते सन्ततं
हालास्येश कृपाकटाक्षलहरी मामापदामास्पदम् ॥ ३ ॥
मालाकल्पितमालुधानफणसन्माणिक्यभास्वत्तनो
मूलाधार जगत्त्रयस्य मुरजिन्नेत्रारविन्दार्चित ।
साराकारभुजासहस्र गिरिश त्रायेत ते सन्ततं
हालास्येश कृपाकटाक्षलहरी मामापदामास्पदम् ॥ ४ ॥
बालादित्यसहस्रकोटिसदृशोद्यद्वेगवत्यापगा-
-वेलाभूमिविहारनिष्ठ विबुधस्रोतस्विनीशेखर ।
बालावर्ण्यकवित्वभूमिसुखद त्रायेत ते सन्ततं
हालास्येश कृपाकटाक्षलहरी मामापदामास्पदम् ॥ ५ ॥
कीलालावनिपावकानिलनभश्चन्द्रार्कयज्वाकृते
कीलानेकसहस्रसङ्कुलशिखस्तम्भस्वरूपामित ।
चोलादीष्टगृहाङ्गनाविभवद त्रायेत ते सन्ततं
हालास्येश कृपाकटाक्षलहरी मामापदामास्पदम् ॥ ६ ॥
लीलार्थाञ्जलिमेकमेव चरतां साम्राज्यलक्ष्मीप्रद
स्थूलाशेषचराचरात्मक जगत् स्थूणाष्टमूर्ते गुरो ।
तालाङ्कानुज फल्गुनप्रियकर त्रायेत ते सन्ततं
हालास्येश कृपाकटाक्षलहरी मामापदामास्पदम् ॥ ७ ॥
हालास्यागतदेवदैत्यमुनिसङ्गीतापदानक्वण-
-त्तूलाकोटिमनोहराङ्घ्रिकमलानन्दापवर्गप्रद ।
श्रीलीलाकर पद्मनाभवरद त्रायेत ते सन्ततं
हालास्येश कृपाकटाक्षलहरी मामापदामास्पदम् ॥ ८ ॥
लीलानादरमोहतः कपटतो यद्वा कदम्बाटवी-
-हालास्याधिपतीष्टमष्टकमिदं सर्वेष्टसन्दोहनम् ।
हालापानफलान्विहाय सन्ततं सङ्कीर्तयन्तीह ये
ते लाक्षार्द्रपदाबलाभिरखिलान् भोगान् लभन्ते सदा ॥ ९ ॥
इति श्रीहालास्यमहात्म्ये कुण्डोदरकृतं श्रीहालास्येशाष्टकम् ।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
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