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कालिका स्तोत्र
ककारादि श्री काली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् पढ़ने से मां काली के 108 शक्तिशाली नामों का स्मरण होता है, जिससे साधक के जीवन से भय, नकारात्मक ऊर्जा, बाधाएं, तांत्रिक प्रभाव और मानसिक अशांति दूर होती है। यह स्तोत्र साधक को साहस, आत्मविश्वास, विवेक, आध्यात्मिक शक्ति और अंतःशुद्धि प्रदान करता है। इसका नियमित पाठ घर में सुरक्षा, समृद्धि, शांति और देवी की कृपा का स्थायी प्रभाव उत्पन्न करता है। कठिन समय, कर्ज, स्वास्थ्य समस्याओं या मानसिक तनाव में यह स्तोत्र विशेष रूप से अतिशीघ्र लाभ देता है और साधक के चारों ओर एक मजबूत दिव्य कवच बना देता है।
घर पर कैसे पढ़ें -
घर के मंदिर में मां काली की फोटो या प्रतिमा के सामने बैठें।
दीपक जलाएँ और संभव हो तो लाल या काले फूल अर्पित करें।
स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूर्व, उत्तर या पूर्वोत्तर दिशा की ओर बैठें।
स्तोत्र को साफ उच्चारण के साथ एकाग्रचित्त होकर पढ़ें।
मंगलवार, शनिवार, अमावस्या या प्रतिदिन सुबह–शाम पाठ करना श्रेष्ठ माना जाता है।
पाठ के बाद काली मां को गुड़, नारियल, या मीठा भोग अर्पित करें।
अंत में “काली माता” का स्मरण कर प्रार्थना करें।
भैरव उवाच ।
शतनाम प्रवक्ष्यामि कालिकाया वरानने ।
यस्य प्रपठनाद्वाग्मी सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ १ ॥
काली कपालिनी कान्ता कामदा कामसुन्दरी ।
कालरात्रिः कालिका च कालभैरवपूजिता ॥ २ ॥
कुरुकुल्ला कामिनी च कमनीयस्वभाविनी ।
कुलीना कुलकर्त्री च कुलवर्त्मप्रकाशिनी ॥ ३ ॥
कस्तूरीरसनीला च काम्या कामस्वरूपिणी ।
ककारवर्णनिलया कामधेनुः करालिका ॥ ४ ॥
कुलकान्ता करालास्या कामार्ता च कलावती ।
कृशोदरी च कामाख्या कौमारी कुलपालिनी ॥ ५ ॥
कुलजा कुलकन्या च कुलहा कुलपूजिता ।
कामेश्वरी कामकान्ता कुञ्जरेश्वरगामिनी ॥ ६ ॥
कामदात्री कामहर्त्री कृष्णा चैव कपर्दिनी ।
कुमुदा कृष्णदेहा च कालिन्दी कुलपूजिता ॥ ७ ॥
काश्यपी कृष्णमाता च कुलिशाङ्गी कला तथा ।
क्रीं रूपा कुलगम्या च कमला कृष्णपूजिता ॥ ८ ॥
कृशाङ्गी किन्नरी कर्त्री कलकण्ठी च कार्तिकी ।
कम्बुकण्ठी कौलिनी च कुमुदा कामजीविनी ॥ ९ ॥
कुलस्त्री कीर्तिका कृत्या कीर्तिश्च कुलपालिका ।
कामदेवकला कल्पलता कामाङ्गवर्धिनी ॥ १० ॥
कुन्ता च कुमुदप्रीता कदम्बकुसुमोत्सुका ।
कादम्बिनी कमलिनी कृष्णानन्दप्रदायिनी ॥ ११ ॥
कुमारीपूजनरता कुमारीगणशोभिता ।
कुमारीरञ्जनरता कुमारीव्रतधारिणी ॥ १२ ॥
कङ्काली कमनीया च कामशास्त्रविशारदा ।
कपालखट्वाङ्गधरा कालभैरवरूपिणी ॥ १३ ॥
कोटरी कोटराक्षी च काशीकैलासवासिनी ।
कात्यायनी कार्यकरी काव्यशास्त्रप्रमोदिनी ॥ १४ ॥
कामाकर्षणरूपा च कामपीठनिवासिनी ।
कङ्किनी काकिनी क्रीडा कुत्सिता कलहप्रिया ॥ १५ ॥
कुण्डगोलोद्भवप्राणा कौशिकी कीर्तिवर्धिनी ।
कुम्भस्तनी कटाक्षा च काव्या कोकनदप्रिया ॥ १६ ॥
कान्तारवासिनी कान्तिः कठिना कृष्णवल्लभा ।
इति ते कथितं देवि गुह्याद्गुह्यतरं परम् ॥ १७ ॥
प्रपठेद्य इदं नित्यं कालीनामशताष्टकम् ।
त्रिषु लोकेषु देवेशि तस्याऽसाध्यं न विद्यते ॥ १८ ॥
प्रातःकाले च मध्याह्ने सायाह्ने च सदा निशि ।
यः पठेत्परया भक्त्या कालीनामशताष्टकम् ॥ १९ ॥
कालिका तस्य गेहे च संस्थानं कुरुते सदा ।
शून्यागारे श्मशाने वा प्रान्तरे जलमध्यतः ॥ २० ॥
वह्निमध्ये च सङ्ग्रामे तथा प्राणस्य संशये ।
शताष्टकं जपन्मन्त्री लभते क्षेममुत्तमम् ॥ २१ ॥
कालीं संस्थाप्य विधिवत् स्तुत्वा नामशताष्टकैः ।
साधकः सिद्धिमाप्नोति कालिकायाः प्रसादतः ॥ २२ ॥
इति श्री काली ककाराष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ।
