श्री कालिकाष्टकम्

श्री कालिकाष्टकम्

श्री कालिकाष्टकम् देवी कालिका को समर्पित आठ श्लोकों वाला स्तोत्र है। इस अष्टक में मां कालिका के उग्र, करुणामयी और संहारक स्वरूप का संक्षिप्त लेकिन व्यापक वर्णन किया गया है। इसका पाठ साधक के मन, वाणी और कर्म से जुड़ी नकारात्मकताओं, भय और बाधाओं को दूर करता है और आंतरिक शक्ति, साहस, मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ाता है। नियमित पाठ से देवी कालिका की कृपा और संरक्षण प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सफलता, सुरक्षा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति सुनिश्चित होती है। यह अष्टक साधक को उनके जीवन में दिव्यता, संतुलन और आध्यात्मिक बल का अनुभव कराता है।

 

 

ध्यानम् –
गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमाला
महाघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।
विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशी
महाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥ १ ॥

भुजेवामयुग्मे शिरोऽसिं दधाना
वरं दक्षयुग्मेऽभयं वै तथैव ।
सुमध्याऽपि तुङ्गस्तना भारनम्रा
लसद्रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥ २ ॥

शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी
लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।
शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभि-
-श्चतुर्दिक्षुशब्दायमानाऽभिरेजे ॥ ३ ॥

स्तुतिः –
विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीन्
समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवुः ।
अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ १ ॥

जगन्मोहिनीयं तु वाग्वादिनीयं
सुहृत्पोषिणी शत्रुसंहारणीयम् ।
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ २ ॥

इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली
मनोजास्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् ।
तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ३ ॥

सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता
लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते ।
जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्का
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ४ ॥

चिदानन्दकन्दं हसन्मन्दमन्दं
शरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।
मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ५ ॥

महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा
कदाचिद्विचित्राकृतिर्योगमाया ।
न बाला न वृद्धा न कामातुरापि
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ६ ॥

क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं
मया लोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत् ।
तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ७ ॥

यदि ध्यानयुक्तं पठेद्यो मनुष्य-
-स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।
गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ८ ॥

इति श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं श्री कालिकाष्टकम् ॥


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

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