श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम्

श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम्

 

श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् का नाम “भुजङ्ग प्रयात” इस प्रकार रखा गया है क्योंकि इसमें देवी की उग्र, गतिशील और नियंत्रित शक्ति का वर्णन साँप (भुजङ्ग) की तरह लचीले और तेज प्रवाह के रूप में किया गया है। इस स्तोत्र के पाठ से साधक के जीवन में नकारात्मक शक्तियाँ, शत्रु बाधाएँ और भय समाप्त होते हैं, जबकि साहस, मानसिक स्पष्टता, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का विकास होता है। यह स्तोत्र साधक को आंतरिक ऊर्जा, दिव्यता और प्रभावशाली व्यक्तित्व का अनुभव कराता है। नियमित पाठ से देवी की कृपा, सुरक्षा और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

 

 

 

 

महाकाल उवाच ।
अथ वक्ष्ये महेशानि देव्याः स्तोत्रमनुत्तमम् ।
यस्य स्मरणमात्रेण विघ्ना यान्ति पराङ्मुखाः ॥ १ ॥

विजेतुं प्रतस्थे यदा कालकस्या-
-सुरान् रावणो मुञ्जमालिप्रवर्हान् ।
तदा कामकालीं स तुष्टाव वाग्भि-
-र्जिगीषुर्मृधे बाहुवीर्येण सर्वान् ॥ २ ॥

महावर्तभीमासृगब्ध्युत्थवीची-
-परिक्षालिता श्रान्तकन्थश्मशाने ।
चितिप्रज्वलद्वह्निकीलाजटाले-
-शिवाकारशावासने सन्निषण्णाम् ॥ ३ ॥

महाभैरवीयोगिनीडाकिनीभिः
करालाभिरापादलम्बत्कचाभिः ।
भ्रमन्तीभिरापीय मद्यामिषास्रा-
-न्यजस्रं समं सञ्चरन्तीं हसन्तीम् ॥ ४ ॥

महाकल्पकालान्तकादम्बिनीत्विट्-
परिस्पर्धिदेहद्युतिं घोरनादाम् ।
स्फुरद्द्वादशादित्यकालाग्निरुद्र-
-ज्वलद्विद्युदोघप्रभादुर्निरीक्ष्याम् ॥ ५ ॥

लसन्नीलपाषाणनिर्माणवेदि-
-प्रभश्रोणिविम्बां चलत्पीवरोरुम् ।
समुत्तुङ्गपीनायतोरोजकुम्भां
कटिग्रन्थितद्वीपिकृत्युत्तरीयाम् ॥ ६ ॥

स्रवद्रक्तवल्गन्नृमुण्डावनद्धा-
-सृगावद्धनक्षत्रमालैकहाराम् ।
मृतब्रह्मकुल्योपक्लुप्ताङ्गभूषां
महाट्‍टाट्‍टहासैर्जगत्त्रासयन्तीम् ॥ ७ ॥

निपीताननान्तामितोद्वृत्तरक्तो-
-च्छलद्धारया स्नापितोरोजयुग्माम् ।
महादीर्घदंष्ट्रायुगन्यञ्चदञ्च-
-ल्ललल्लेलिहानोग्रजिह्वाग्रभागाम् ॥ ८ ॥

चलत्पादपद्मद्वयालम्बिमुक्त-
-प्रकम्पालिसुस्निग्धसम्भुग्नकेशाम् ।
पदन्याससम्भारभीताहिराजा-
-ननोद्गच्छदात्मस्तुतिव्यस्तकर्णाम् ॥ ९ ॥

महाभीषणां घोरविंशार्धवक्त्रै-
-स्तथासप्तविंशान्वितैर्लोचनैश्च ।
पुरोदक्षवामे द्विनेत्रोज्ज्वलाभ्यां
तथान्यानने त्रित्रिनेत्राभिरामाम् ॥ १० ॥

लसद्द्वीपिहर्यक्षफेरुप्लवङ्ग-
-क्रमेलर्क्षतार्क्षद्विपग्राहवाहैः ।
मुखैरीदृशाकारितैर्भ्राजमानां
महापिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम् ॥ ११ ॥

भुजैः सप्तविंशाङ्कितैर्वामभागे
युतां दक्षिणे चापि तावद्भिरेव ।
क्रमाद्रत्नमालां कपालं च शुष्कं
ततश्चर्मपाशं सुदीर्घं दधानाम् ॥ १२ ॥

ततः शक्तिखट्वाङ्गमुण्डं भुशुण्डीं
धनुश्चक्रघण्टाशिशुप्रेतशैलान् ।
ततो नारकङ्कालबभ्रूरगोन्मा-
-दवंशीं तथा मुद्गरं वह्निकुण्डम् ॥ १३ ॥

अधो डम्मरुं पारिघं भिन्दिपालं
तथा मौशलं पट्‍टिशं प्राशमेवम् ।
शतघ्नीं शिवापोतकं चाथ दक्षे
महारत्नमालां तथा कर्तृखड्गौ ॥ १४ ॥

चलत्तर्जनीमङ्कुशं दण्डमुग्रं
लसद्रत्नकुम्भं त्रिशूलं तथैव ।
शरान् पाशुपत्यांस्तथा पञ्च कुन्तं
पुनः पारिजातं छुरीं तोमरं च ॥ १५ ॥

प्रसूनस्रजं डिण्डिमं गृध्रराजं
ततः कोरकं मांसखण्डं श्रुवं च ।
फलं बीजपूराह्वयं चैव सूचीं
तथा पर्शुमेवं गदां यष्टिमुग्राम् ॥ १६ ॥

ततो वज्रमुष्टिं कुणप्पं सुघोरं
तथा लालनं धारयन्तीं भुजैस्तैः ।
जवापुष्परोचिष्फणीन्द्रोपक्लुप्त-
-क्वणन्नूपुरद्वन्द्वसक्ताङ्घ्रिपद्माम् ॥ १७ ॥

महापीतकुम्भीनसावद्धनद्ध
स्फुरत्सर्वहस्तोज्ज्वलत्कङ्कणां च ।
महापाटलद्योतिदर्वीकरेन्द्रा-
-वसक्ताङ्गदव्यूहसंशोभमानाम् ॥ १८ ॥

महाधूसरत्त्विड्भुजङ्गेन्द्रक्लुप्त-
-स्फुरच्चारुकाटेयसूत्राभिरामाम् ।
चलत्पाण्डुराहीन्द्रयज्ञोपवीत-
-त्विडुद्भासिवक्षःस्थलोद्यत्कपाटाम् ॥ १९ ॥

पिषङ्गोरगेन्द्रावनद्धावशोभा-
-महामोहबीजाङ्गसंशोभिदेहाम् ।
महाचित्रिताशीविषेन्द्रोपक्लुप्त-
-स्फुरच्चारुताटङ्कविद्योतिकर्णाम् ॥ २० ॥

वलक्षाहिराजावनद्धोर्ध्वभासि-
-स्फुरत्पिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम् ।
महाशोणभोगीन्द्रनिस्यूतमूण्डो-
-ल्लसत्किङ्कणीजालसंशोभिमध्याम् ॥ २१ ॥

सदा संस्मरामीदृशों कामकालीं
जयेयं सुराणां हिरण्योद्भवानाम् ।
स्मरेयुर्हि येऽन्येऽपि ते वै जयेयु-
-र्विपक्षान्मृधे नात्र सन्देहलेशः ॥ २२ ॥

पठिष्यन्ति ये मत्कृतं स्तोत्रराजं
मुदा पूजयित्वा सदा कामकालीम् ।
न शोको न पापं न वा दुःखदैन्यं
न मृत्युर्न रोगो न भीतिर्न चापत् ॥ २३ ॥

धनं दीर्घमायुः सुखं बुद्धिरोजो
यशः शर्मभोगाः स्त्रियः सूनवश्च ।
श्रियो मङ्गलं बुद्धिरुत्साह आज्ञा
लयः सर्व विद्या भवेन्मुक्तिरन्ते ॥ २४ ॥

इति श्री महाकालसंहितायां दशम पटले रावण कृत श्री कामकलाकाली भुजङ्ग प्रयात स्तोत्रम् ॥


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

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