श्री महाकाली शतनाम स्तोत्रम् (बृहन्नीलतन्त्रे)

श्री महाकाली शतनाम स्तोत्रम् (बृहन्नीलतन्त्रे)

श्री महाकाली शतनाम स्तोत्रम् (बृहन्नीलतंत्रे) का पाठ घर पर मां महाकाली की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर और श्रद्धा भाव से करना चाहिए; इसे मंगलवार, शनिवार, अमावस्या या नवरात्रि में विशेष रूप से पढ़ना शुभ माना जाता है। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भय, नकारात्मक शक्तियाँ और बाधाएँ समाप्त होती हैं, मानसिक शांति और साहस बढ़ता है, पारिवारिक सुख-समृद्धि आती है और साधक के जीवन में देवी महाकाली का दिव्य संरक्षण और शीघ्र कृपा प्राप्त होती है।

 

 

 

 

श्रीदेव्युवाच ।
पुरा प्रतिश्रुतं देव क्रीडासक्तो यदा भवान् ।
नाम्नां शतं महाकाल्याः कथयस्व मयि प्रभो ॥ १ ॥

श्रीभैरव उवाच ।
साधु पृष्टं महादेवि अकथ्यं कथयामि ते ।
न प्रकाश्यं वरारोहे स्वयोनिरिव सुन्दरि ॥ २ ॥

प्राणाधिकप्रियतरा भवती मम मोहिनी ।
क्षणमात्रं न जीवामि त्वां विना परमेश्वरि ॥ ३ ॥

यथादर्शेऽमले बिम्बं घृतं दध्यादिसम्युतम् ।
तथाहं जगतामाद्ये त्वयि सर्वत्र गोचरः ॥ ४ ॥

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि जपात् सार्वज्ञदायकम् ।
सदाशिव ऋषिः प्रोक्तोऽनुष्टुप् छन्दश्च ईरितः ॥ ५ ॥

देवता भैरवो देवि पुरुषार्थचतुष्टये ।
विनियोगः प्रयोक्तव्यः सर्वकर्मफलप्रदः ॥ ६ ॥

अथ स्तोत्रम् ।
महाकाली जगद्धात्री जगन्माता जगन्मयी ।
जगदम्बा जगत्सारा जगदानन्दकारिणी ॥ ७ ॥

जगद्विध्वंसिनी गौरी दुःखदारिद्र्यनाशिनी ।
भैरवभाविनी भावानन्ता सारस्वतप्रदा ॥ ८ ॥

चतुर्वर्गप्रदा साध्वी सर्वमङ्गलमङ्गला ।
भद्रकाली विशालाक्षी कामदात्री कलात्मिका ॥ ९ ॥

नीलवाणी महागौरसर्वाङ्गा सुन्दरी परा ।
सर्वसम्पत्प्रदा भीमनादिनी वरवर्णिनी ॥ १० ॥

वरारोहा शिवारोहा महिषासुरघातिनी ।
शिवपूज्या शिवप्रीता दानवेन्द्रप्रपूजिता ॥ ११ ॥

सर्वविद्यामयी शर्वसर्वाभीष्टफलप्रदा ।
कोमलाङ्गी विधात्री च विधातृवरदायिनी ॥ १२ ॥

पूर्णेन्दुवदना नीलमेघवर्णा कपालिनी ।
कुरुकुल्ला विप्रचित्ता कान्तचित्ता मदोन्मदा ॥ १३ ॥

मत्ताङ्गी मदनप्रीता मदाघूर्णितलोचना ।
मदोत्तीर्णा खर्पराऽसिनरमुण्डविलासिनी ॥ १४ ॥

नरमुण्डस्रजा देवी खड्गहस्ता भयानका ।
अट्‍टहासयुता पद्मा पद्मरागोपशोभिता ॥ १५ ॥

वराऽभयप्रदा काली कालरात्रिस्वरूपिणी ।
स्वधा स्वाहा वषट्कारा शरदिन्दुसमप्रभा ॥ १६ ॥

शरत्ज्योत्स्ना च संह्लादा विपरीतरतातुरा ।
मुक्तकेशी छिन्नजटा जटाजूटविलासिनी ॥ १७ ॥

सर्पराजयुता भीमा सर्पराजोपरिस्थिता ।
श्मशानस्था महानन्दिस्तुता सन्दीप्तलोचना ॥ १८ ॥

शवासनरता नन्दा सिद्धचारणसेविता ।
बलिदानप्रिया गर्भा भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणी ॥ १९ ॥

गायत्री चैव सावित्री महानीलसरस्वती ।
लक्ष्मीर्लक्षणसम्युक्ता सर्वलक्षणलक्षिता ॥ २० ॥

व्याघ्रचर्मावृता मेध्या त्रिवलीवलयाञ्चिता ।
गन्धर्वैः संस्तुता सा हि तथा चेन्दा महापरा ॥ २१ ॥

पवित्रा परमा माया महामाया महोदया ।
इति ते कथितं दिव्यं शतं नाम्नां महेश्वरि ॥ २२ ॥

यः पठेत् प्रातरुत्थाय स तु विद्यानिधिर्भवेत् ।
इह लोके सुखं भुक्त्वा देवीसायुज्यमाप्नुयात् ॥ २३ ॥

तस्य वश्या भवन्त्येते सिद्धौघाः सचराचराः ।
खेचरा भूचराश्चैव तथा स्वर्गचराश्च ये ॥ २४ ॥

ते सर्वे वशमायान्ति साधकस्य हि नान्यथा ।
नाम्नां वरं महेशानि परित्यज्य सहस्रकम् ॥ २५ ॥

पठितव्यं शतं देवि चतुर्वर्गफलप्रदम् ।
अज्ञात्वा परमेशानि नाम्नां शतं महेश्वरि ॥ २६ ॥

भजते यो महकालीं सिद्धिर्नास्ति कलौ युगे ।
प्रपठेत् प्रयतो भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २७ ॥

लक्षवर्षसहस्रस्य कालीपूजाफलं भवेत् ।
बहुना किमिहोक्तेन वाञ्छितार्थी भविष्यति ॥ २८ ॥

इति श्रीबृहन्नीलतन्त्रे त्रयोविंशः पटले भैरवपार्वतीसंवादे श्री महाकाली शतनाम स्तोत्रम् ॥


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

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