श्री महाकाली स्तोत्रम्

श्री महाकाली स्तोत्रम्

श्री महाकाली स्तोत्रम् का पाठ घर पर मां महाकाली की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर और पूर्ण श्रद्धा के साथ करना चाहिए; इसे विशेष रूप से मंगलवार, शनिवार, अमावस्या या नवरात्रि में पढ़ना शुभ माना जाता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ भय, नकारात्मक शक्तियों और बाधाओं को समाप्त करता है, मानसिक शांति, साहस और आत्मविश्वास बढ़ाता है, जीवन में समृद्धि और सुरक्षा लाता है तथा साधक पर देवी महाकाली की कृपा और दिव्य संरक्षण स्थापित करता है।

 

 

ध्यानम् ।
शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां वरप्रदां
हास्ययुक्तां त्रिणेत्राञ्च कपाल कर्त्रिका कराम् ।
मुक्तकेशीं ललज्जिह्वां पिबन्तीं रुधिरं मुहुः
चतुर्बाहुयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत् ॥

शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीं
चतुर्भुजां खड्गमुण्डवराभयकरां शिवाम् ।
मुण्डमालाधरां देवीं ललज्जिह्वां दिगम्बरां
एवं सञ्चिन्तयेत्कालीं श्मशनालयवासिनीम् ॥

अथ स्तोत्रम् ।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभाम् ॥ १ ॥

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥ २ ॥

अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवी जननी परा ॥ ३ ॥

त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतद्सृज्यते जगत् ।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥ ४ ॥

विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ।
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥ ५ ॥

महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ।
महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ॥ ६ ॥

प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥ ७ ॥

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥ ८ ॥

खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ॥ ९ ॥

सौम्या सौम्यतराशेषा सौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ॥ १० ॥

यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥ ११ ॥

यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ।
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥ १२ ॥

विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ।
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ॥ १३ ॥

सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ।
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ॥ १४ ॥

प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥ १५ ॥

इति श्री महाकाली स्तोत्रम् ।


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

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