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मंत्र
ॐ श्री लक्ष्मी नरसिंहाय नमः
अर्थ: यह शक्तिशाली बीज मंत्र भगवान नरसिंह और माँ लक्ष्मी की संयुक्त कृपा को आमंत्रित करता है। इस मंत्र के जप से नकारात्मकता, भय और बाधाएँ समाप्त होती हैं। यह मन को शांति, सुरक्षा और धन-संपदा प्रदान करता है।
ॐ उग्रं वीरं महा विष्णुं ज्वलन्तं सर्वतो मुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युर्मृत्युं नमाम्यहम्॥
अर्थ: मैं भगवान विष्णु के उग्र, वीर और तेजस्वी रूप भगवान नरसिंह को नमन करता हूँ, जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं। वे भक्तों के रक्षक और दुष्टों के विनाशक हैं, जो सर्वत्र प्रकाशमान हैं।
ध्याये नृसिंहं तरुणार्क नेत्रं, सीताम्बुजातं ज्वलदग्रिव वक्त्रं। अनादिमध्यन्तमजं पुराणं, परात्परेशं जगतां निधानम्॥
अर्थ: जिनके नेत्र उदय होते सूर्य के समान चमकते हैं, जिनका मुख अग्नि के समान दीप्तिमान है — उन भगवान नरसिंह का ध्यान करने से भय, दुख और संकट दूर होते हैं तथा मन में अडिग श्रद्धा और साहस की उत्पत्ति होती है।
ॐ वज्र नखाय विद्महे तीक्ष्ण दंष्ट्राय धीमहि। तन्नो नृसिंहः प्रचोदयात्॥
अर्थ: यह गायत्री मंत्र भगवान नरसिंह के तेजस्वी स्वरूप का ध्यान कराता है। उनके वज्र समान नख और तीक्ष्ण दाँत शक्ति और विवेक का प्रतीक हैं। इस मंत्र से ज्ञान, बल और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।
ॐ नृं म्लोल नरसिंहाय पूरय पूरय॥
अर्थ: यह मंत्र धन संबंधी अड़चनें दूर कर जीवन में समृद्धि लाता है। व्यापार, नौकरी और आर्थिक स्थिरता के लिए यह अत्यंत शुभ माना गया है।
वैदिक शास्त्रों के अनुसार भगवान नरसिंह भगवान विष्णु का चौथा अवतार हैं। उनका स्वरूप अर्ध-मानव और अर्ध-सिंह का है। वे भक्तों के रक्षक और अधर्म के विनाशक माने जाते हैं। संध्या काल में नरसिंह भगवान की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है, क्योंकि इसी समय वे प्रकट हुए थे। उनकी आराधना से भय, रोग, शत्रु और पाप नष्ट होते हैं।
प्राचीन कथा के अनुसार असुरराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तप कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया कि उसे न कोई मनुष्य मारेगा, न कोई पशु; न दिन में न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न धरती पर न आकाश में, और न किसी अस्त्र-शस्त्र से। वरदान के बाद उसने अत्याचार प्रारंभ कर दिया और भगवान विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया। उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का परम भक्त था। पिता के विरोध के बावजूद उसने प्रभु भक्ति नहीं छोड़ी। एक दिन हिरण्यकशिपु ने क्रोध में कहा — “यदि तेरा भगवान सर्वत्र है, तो क्या वह इस खंभे में भी है?” यह कहकर उसने खंभे पर प्रहार किया। उसी क्षण भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए — न पूर्ण मनुष्य, न पशु, संध्या समय (न दिन न रात), द्वार की चौखट पर (न घर के अंदर न बाहर)। उन्होंने हिरण्यकशिपु को अपनी जंघा पर रखकर नखों से उसका वध किया। इस प्रकार भगवान ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और धर्म की पुनः स्थापना की।
इस मंत्र का जप संध्या काल में, सूर्यास्त से पूर्व करना सबसे शुभ माना गया है।
जप से पहले स्नान करें और स्वच्छ या पीले वस्त्र धारण करें।
भगवान नरसिंह की मूर्ति या चित्र को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में पीले या लाल वस्त्र पर स्थापित करें।
घी का दीपक जलाकर चंदन, पुष्प (गेंदा या कमल), धूप अर्पित करें।
दूध, मधु, पंचामृत और जल से अभिषेक करें तथा भगवान का नाम जपते रहें।
दही, मक्खन, फल या सत्तू का भोग लगाएं।
तुलसी या रुद्राक्ष की माला से श्रद्धापूर्वक जप करें और भय तथा नकारात्मकता से मुक्ति की प्रार्थना करें।
दुष्ट शक्तियों, तंत्र-मंत्र, और ग्रह दोषों से रक्षा प्रदान करता है।
छिपे शत्रुओं और ईर्ष्या या दृष्टि दोष के प्रभाव को नष्ट करता है।
मन को शांति, आत्मबल और साहस प्रदान करता है।
जीवन, कार्य और संबंधों में आने वाली बाधाओं को दूर करता है।
भय, चिंता और अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है।
कालसर्प दोष और अन्य ज्योतिषीय दोषों के प्रभाव को समाप्त करता है।
दीर्घकालिक रोगों से मुक्ति और आरोग्यता प्रदान करता है।
व्यापार, नौकरी या आर्थिक मामलों में सफलता और उन्नति देता है।
शत्रुओं पर विजय और न्यायिक मामलों में सफलता दिलाता है।
माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कर समृद्धि और सौभाग्य बढ़ाता है।
