श्री राघवाष्टकम्

श्री राघवाष्टकम्

श्री राघवाष्टकम् भगवान श्रीराम की महिमा, करुणा, शौर्य, धर्मनिष्ठा और दिव्य स्वरूप का वर्णन करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है, जिसे आदरपूर्वक पढ़ने से मन में भक्ति, शांति और शक्ति का संचार होता है। इस स्तोत्र में श्रीराम को सृष्टि के नाथ, धर्म के आधार, भय और पाप का नाश करने वाले, भक्तों की सभी इच्छाएँ पूर्ण करने वाले तथा दुःख-शोक को दूर करने वाले परम करुणामय भगवान के रूप में स्तुत किया गया है। श्री राघवाष्टकम् का नियमित पाठ मानसिक कष्ट, भय, बाधाएँ और नकारात्मकता दूर करता है, जीवन में साहस, संयम, निर्णय-शक्ति और सद्गुणों को बढ़ाता है तथा घर में शांति और सौभाग्य लाता है। इसे भोर में, संध्या के समय या किसी भी समय श्रद्धा और एकाग्रता से पढ़ने पर श्रीराम की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में दिव्य संरक्षण और मार्गदर्शन मिलता है।

 

 

राघवं करुणाकरं मुनिसेवितं सुरवन्दितं
जानकीवदनारविन्ददिवाकरं गुणभाजनम् ।
वालिसूनुहितैषिणं हनुमत्प्रियं कमलेक्षणं
यातुधानभयङ्करं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ १ ॥

मैथिलीकुचभूषणामल नीलमौक्तिकमीश्वरं
रावणानुजपालनं रघुपुङ्गवं मम दैवतम् ।
नागरीवनिताननाम्बुजबोधनीयकलेवरं
सूर्यवंशविवर्धनं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ २ ॥

हेमकुण्डलमण्डितामलकण्ठदेशमरिन्दमं
शातकुम्भ मयूरनेत्रविभूषणेन विभूषितम् ।
चारुनूपुरहारकौस्तुभकर्णभूषणभूषितं
भानुवंशविवर्धनं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ ३ ॥

दण्डकाख्यवने रतामरसिद्धयोगिगणाश्रयं
शिष्टपालनतत्परं धृतिशालिपार्थकृतस्तुतिम् ।
कुम्भकर्णभुजाभुजङ्गविकर्तने सुविशारदं
लक्ष्मणानुजवत्सलं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ ४ ॥

केतकीकरवीरजातिसुगन्धिमाल्यसुशोभितं
श्रीधरं मिथिलात्मजाकुचकुङ्कुमारुणवक्षसम् ।
देवदेवमशेषभूतमनोहरं जगतां पतिं
दासभूतभयापहं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ ५ ॥

यागदानसमाधिहोमजपादिकर्मकरैर्द्विजैः
वेदपारगतैरहर्निशमादरेण सुपूजितम् ।
ताटकावधहेतुमङ्गदतातवालिनिषूदनं
पैतृकोदितपालकं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ ६ ॥

लीलया खरदूषणादिनिशाचराशुविनाशनं
रावणान्तकमच्युतं हरियूथकोटिगणाश्रयम् ।
नीरजाननमम्बुजाङ्घ्रियुगं हरिं भुवनाश्रयं
देवकार्यविचक्षणं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ ७ ॥

कौशिकेन सुशिक्षितास्त्रकलापमायतलोचनं
चारुहासमनाथबन्धुमशेषलोकनिवासिनम् ।
वासवादिसुरारिरावणशासनं च पराङ्गतिं
नीलमेघनिभाकृतिं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ ८ ॥

राघवाष्टकमिष्टसिद्धिदमच्युताश्रयसाधकं
मुक्तिभुक्तिफलप्रदं धनधान्यसिद्धिविवर्धनम् ।
रामचन्द्रकृपाकटाक्षदमादरेण सदा जपेत्
रामचन्द्रपदाम्बुजद्वय सन्ततार्पितमानसः ॥ ९ ॥

राम राम नमोऽस्तु ते जय रामभद्र नमोऽस्तु ते
रामचन्द्र नमोऽस्तु ते जय राघवाय नमोऽस्तु ते ।
देवदेव नमोऽस्तु ते जय देवराज नमोऽस्तु ते
वासुदेव नमोऽस्तु ते जय वीरराज नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥

इति श्री राघवाष्टकम् ।


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।

कैटेगरी

आपके लिए रिपोर्ट्स

    अनुशंसित पूजा

      Ask Question

      आपके लिए खरीदारी

      आपके लिए रिपोर्ट्स

      त्रिलोक ऐप में आपका स्वागत है!

      image